Ahmad Rahi

Top 10 of Ahmad Rahi

    कोई वादा भी तो वफ़ा न हुआ
    बे-वफ़ाओं से प्यार कौन करे
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    दर्द की बात किसी हँसती हुई महफ़िल में
    जैसे कह दे किसी तुर्बत पे लतीफ़ा कोई
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    कहीं ये अपनी मोहब्बत की इंतिहा तो नहीं
    बहुत दिनों से तिरी याद भी नहीं आई
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    क़द ओ गेसू लब-ओ-रुख़्सार के अफ़्साने चले
    आज महफ़िल में तिरे नाम पे पैमाने चले

    अभी तू ने दिल-ए-शोरीदा को देखा क्या है
    मौज में आए तो तूफ़ानों से टकराने चले

    देखें अब रहता है किस किस का गरेबाँ साबित
    चाक-ए-दिल ले के तिरी बज़्म से दीवाने चले

    फिर किसी जश्न-ए-चराग़ाँ का गुमाँ है शायद
    आज हर सम्त से पुर-सोख़्ता परवाने चले

    ये मसीहाई भी इक तुर्फ़ा-तमाशा है कि जब
    दम उलट जाए तो वो ज़ख़्मों को सहलाने चले

    जिस ने उलझाया है कितने ही दिलों को यारो
    हम भी उस ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर को सुलझाने चले
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    ग़म-ए-हयात में कोई कमी नहीं आई
    नज़र-फ़रेब थी तेरी जमाल-आराई

    वो दास्ताँ जो तिरी दिलकशी ने छेड़ी थी
    हज़ार बार मिरी सादगी ने दोहराई

    फ़साने आम सही मेरी चश्म-ए-हैराँ के
    तमाशा बनते रहे हैं यहाँ तमाशाई

    तिरी वफ़ा तिरी मजबूरियाँ बजा लेकिन
    ये सोज़िश-ए-ग़म-ए-हिज्राँ ये सर्द तन्हाई

    किसी के हुस्न-ए-तमन्ना का पास है वर्ना
    मुझे ख़याल-ए-जहाँ है न ख़ौफ़-ए-रुस्वाई

    मैं सोचता हूँ ज़माने का हाल क्या होगा
    अगर ये उलझी हुई ज़ुल्फ़ तू ने सुलझाई

    कहीं ये अपनी मोहब्बत की इंतिहा तो नहीं
    बहुत दिनों से तिरी याद भी नहीं आई
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    गर्दिश-ए-जाम नहीं गर्दिश-ए-अय्याम तो है
    सई-ए-नाकाम सही फिर भी कोई काम तो है

    दिल की बेताबी का आख़िर कहीं अंजाम तो है
    मेरी क़िस्मत में नहीं दहर में आराम तो है

    माइल-ए-लुत्फ़-ओ-करम हुस्न-ए-दिल-आराम तो है
    मेरी ख़ातिर न सही कोई सर-ए-बाम तो है

    तू नहीं मेरा मसीहा मिरा क़ातिल ही सही
    मुझ से वाबस्ता किसी तौर तिरा नाम तो है

    हल्क़ा-ए-मौज में इक और सफ़ीना आया
    साहिल-ए-बहर पे कोहराम का हंगाम तो है

    तंग-दस्तो तही-दामानो करो शुक्र-ए-ख़ुदा
    मय-ए-गुलफ़ाम नहीं है शफ़क़-ए-शाम तो है
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    कभी हयात का ग़म है कभी तिरा ग़म है
    हर एक रंग में नाकामियों का मातम है

    ख़याल था तिरे पहलू में कुछ सुकूँ होगा
    मगर यहाँ भी वही इज़्तिराब पैहम है

    मिरे हबीब मिरी मुस्कुराहटों पे न जा
    ख़ुदा-गवाह मुझे आज भी तिरा ग़म है

    सहर से रिश्ता-ए-उम्मीद बाँधने वाले
    चराग़-ए-ज़ीस्त की लौ शाम ही से मद्धम है

    ये किस मक़ाम पे ले आई ज़िंदगी 'राही'
    क़दम क़दम पे जहाँ बेबसी का आलम है
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    कोई हसरत भी नहीं कोई तमन्ना भी नहीं
    दिल वो आँसू जो किसी आँख से छलका भी नहीं

    रूठ कर बैठ गई हिम्मत-ए-दुश्वार-पसंद
    राह में अब कोई जलता हुआ सहरा भी नहीं

    आगे कुछ लोग हमें देख के हँस देते थे
    अब ये आलम है कोई देखने वाला भी नहीं

    दर्द वो आग कि बुझती नहीं जलती भी नहीं
    याद वो ज़ख़्म कि भरता नहीं रिसता भी नहीं

    बादबाँ खोल के बैठे हैं सफ़ीनों वाले
    पार उतरने के लिए हल्का सा झोंका भी नहीं
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    दिन को रहते झील पर दरिया किनारे रात को
    याद रखना चाँद तारो इस हमारी बात को

    अब कहाँ वो महफ़िलें हैं अब कहाँ वो हम-नशीं
    अब कहाँ से लाएँ उन गुज़रे हुए लम्हात को

    पड़ चुकी हैं उतनी गिर्हें कुछ समझ आता नहीं
    कैसे सुलझाएँ भला उलझे हुए हालात को

    कितनी तूफ़ानी थीं रातें जिन में दो दीवाने दिल
    थपकियाँ देते रहे भड़के हुए जज़्बात को

    दर्द में डूबी हुई लय बन गई है ज़िंदगी
    भूल जाते काश हम उल्फ़त-भरे नग़्मात को

    वो कि अपने प्यार की थी भीगी भीगी इब्तिदा
    याद कर के रो दिया दिल आज उस बरसात को
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    दिन गुज़रता है कहाँ रात कहाँ होती है
    दर्द के मारों से अब बात कहाँ होती है

    एक से चेहरे तो होते हैं कई दुनिया में
    एक सी सूरत-ए-हालात कहाँ होती है

    ज़िंदगी के वो किसी मोड़ पे गाहे गाहे
    मिल तो जाते हैं मुलाक़ात कहाँ होती है

    आसमानों से कोई बूँद नहीं बरसेगी
    जलते सहराओं में बरसात कहाँ होती है

    यूँ तो औरों की बहुत बातें सुनाईं उन को
    अपनी जो बात है वो बात कहाँ होती है

    जैसी आग़ाज़-ए-मोहब्बत में हुआ करती है
    वैसी फिर शिद्दत-ए-जज़्बात कहाँ होती है

    प्यार की आग बना देती है कुंदन जिन को
    उन के ज़ेहनों में भला ज़ात कहाँ होती है
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    Ahmad Rahi
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