din ko rahte jheel par dariyaa kinaare raat ko | दिन को रहते झील पर दरिया किनारे रात को

  - Ahmad Rahi

दिन को रहते झील पर दरिया किनारे रात को
याद रखना चाँद तारो इस हमारी बात को

अब कहाँ वो महफ़िलें हैं अब कहाँ वो हम-नशीं
अब कहाँ से लाएँ उन गुज़रे हुए लम्हात को

पड़ चुकी हैं उतनी गिर्हें कुछ समझ आता नहीं
कैसे सुलझाएँ भला उलझे हुए हालात को

कितनी तूफ़ानी थीं रातें जिन में दो दीवाने दिल
थपकियाँ देते रहे भड़के हुए जज़्बात को

दर्द में डूबी हुई लय बन गई है ज़िंदगी
भूल जाते काश हम उल्फ़त-भरे नग़्मात को

वो कि अपने प्यार की थी भीगी भीगी इब्तिदा
याद कर के रो दिया दिल आज उस बरसात को

  - Ahmad Rahi

Kashmir Shayari

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