मैं ने पूछा कि है क्या शग़्ल तो हँसकर बोले
आज कल हम तेरे मरने की दुआ करते हैं
आज कल हम तेरे मरने की दुआ करते हैं
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पा-शिकस्तों को जब जब मिलेंगे आप
सर-ए-राह-ए-तलब मिलेंगे आप
सर-ए-राह-ए-तलब मिलेंगे आप
उन से पूछा कि कब मिलेंगे आप
बोले जब जाँ-ब-लब मिलेंगे आप
दिल ये कह कर ख़बर को उस की चला
मुझ को ज़िंदा न अब मिलेंगे आप
अर्सा-ए-हश्र ईद-गाह हुआ
सब से मिल लेंगे जब मिलेंगे आप
वस्ल में भी जबीं पे होगी शिकन
तोड़ने को ग़ज़ब मिलेंगे आप
बे-ख़ुदों को तलाश से क्या काम
हर जगह बे-तलब मिलेंगे आप
छोड़ दी रुख़ पे ज़ुल्फ़ समझे हम
छुप के एक आध शब मिलेंगे आप
छेड़ मुतरिब तराना-ए-शब-ए-वस्ल
साज़-ए-ऐश-ओ-तरब मिलेंगे आप
यार जब मिल गया तो हम से 'जलाल'
जो न मिलते थे सब मिलेंगे आप
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न ठेरी जब कोई तस्कीन-ए-दिल की शक्ल यारों में
तो आ निकले तड़प कर हम तुम्हारे बे-क़रारों में
तो आ निकले तड़प कर हम तुम्हारे बे-क़रारों में
किसी के इश्क़ में दर्द-ए-जिगर से दिल ये कहता है
इधर भी आ निकलना हम भी हैं उम्मीदवारों में
वो मातम बज़्म-ए-शादी है तुम्हारी जिस में शिरकत हो
वो मरना ज़िंदगी है तुम जहाँ हो सोगवारों में
तअ'ल्ली से ये नफ़रत है कि बा'द-ए-मर्ग ख़ाक अपनी
अगर उठती भी है जा बैठती है ख़ाकसारों में
हमारे दिल ने हम से बे-वफ़ाई कर के क्या पाया
वहाँ भी जा के ठहराया गया बे-ए'तिबारों में
वो खींचूँगा 'जलाल' आहें कि उस की ख़ाक उड़ा देंगी
फ़लक ने पीस डाला है समझ कर ख़ाकसारों में
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जज़्ब भी कुछ ऐ तसव्वुर चाहिए
ख़ुद खिंचे जिस शोख़ की तस्वीर खींच
ऐ मोहब्बत दाग़-ए-दिल मुरझा न जाएँ
इत्र इन फूलों का बे-ताख़ीर खींच
आ बुतों में देख ज़ाहिद शान-ए-हक़
दैर में चल नारा-ए-तकबीर खींच
एक साग़र पी के बूढ़ा हो जवान
वो शराब ऐ मय-कदे के पैर खींच
दिल न उस बुत का दुखे कहता है इश्क़
खींच जो नाला वो बे-तासीर खींच
दिल इधर बेताब है तरकश उधर
खींचता हूँ आह मैं तू तीर खींच
कुछ तो काम आ हिज्र में ओ इज़्तिराब
शोख़ी-ए-महबूब की तस्वीर खींच
क़ैस से दश्त-ए-जुनूँ में कह 'जलाल'
आगे आगे चल मिरे ज़ंजीर खींच
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सुब्ह करना शब-ए-ग़म का कभी मुमकिन ही नहीं
आ के दिन फेर दे अपने वो कोई दिन ही नहीं
दिल-ए-बे-ताब मोहब्बत को हो किस तरह सुकूँ
दोनों हर्फ़ों में जब उस के कोई साकिन ही नहीं
क्या मज़म्मत है मुझे सुब्ह-ए-शब-ए-हिज्र उन से
जिन से कहता था कि बचना मिरा मुमकिन ही नहीं
शब-ए-फ़ुर्क़त उसे मौत आ गई मेरे बदले
दे अज़ाँ सुब्ह की कौन आज मोअज़्ज़िन ही नहीं
बिस्तर-ए-ग़म से उठा कर ये बिठाता है हमें
कोई जुज़ दर्द-ए-जिगर और मुआविन ही नहीं
राह चलते भी ये पूछें कि किधर आ निकले
जैसे हम कूचा-ए-महबूब के साकिन ही नहीं
याद-ए-गेसू ने दिखाया है वो आलम हम को
रात रहती है जहाँ आठ पहर दिन ही नहीं
बंदा-ए-इशक़ हैं ईमान की कहते हैं 'जलाल'
हम को काफ़िर जो समझता है वो मोमिन ही नहीं
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कहाँ हम ने न इस दर्द-ए-निहानी का असर पाया
यहाँ उट्ठा वहाँ चमका इधर आया उधर पाया
पता उस ने दिया तेरा मिला जो इश्क़ में ख़ुद गुम
ख़बर तेरी उसी से पाई जिस को बे-ख़बर पाया
दिल-ए-बेताब के पहलू से जाते ही गया सब कुछ
न पाईं सीने में आहें न आहों में असर पाया
वो चश्म-ए-मुंतज़िर थी जिस को देखा आ के वा तुम ने
वो नाला था हमारा जिस को सोते रात भर पाया
मैं हूँ वो ना-तवाँ पिन्हाँ रहा ख़ुद आँख से अपनी
हमेशा आप को गुम सूरत-ए-तार-ए-नज़र पाया
हबीब अपना अगर देखा तो दाग़-ए-इश्क़ को देखा
तबीब अपना अगर पाया तो इक दर्द-ए-जिगर पाया
क्या गुम हम ने दिल को जुस्तुजू में दाग़-ए-हसरत की
किसी को पा के खो बैठे किसी को ढूँढ़ कर पाया
बहुत से अश्क-ए-रंगीं ऐ 'जलाल' इस आँख से टपके
मगर बे-रंग ही देखा न कुछ रंग-ए-असर पाया
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गई थी कह के मैं लाती हूँ ज़ुल्फ़-ए-यार की बू
फिरी तो बाद-ए-सबा का दिमाग़ भी न मिला
चराग़ ले के इरादा था यार को ढूँडें
शब-ए-फ़िराक़ थी कोई चराग़ भी न मिला
ख़बर को यार की भेजा था गुम हुए ऐसे
हवा से-ए-रफ़्ता का अब तक सुराग़ भी न मिला
'जलाल' बाग़-ए-जहाँ में वो अंदलीब हैं हम
चमन को फूल मिले हम को दाग़ भी न मिला
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क्या धूम भी नालों से मचाई नहीं जाती
सोती हुई तक़दीर जगाई नहीं जाती
कुछ शिकवा न करते न बिगड़ता वो शब-ए-वस्ल
अब हम से कोई बात बनाई नहीं जाती
देखो तो ज़रा ख़ाक में हम मिलते हैं क्यूँकर
ये नीची निगह अब भी उठाई नहीं जाती
कहती है शब-ए-हिज्र बहुत ज़िंदा रहोगे
माँगा करो तुम मौत अभी आई नहीं जाती
वो हम से मुकद्दर हैं तो हम उन से मुकद्दर
कह देते हैं साफ़ अपनी सफ़ाई नहीं जाती
हम सुल्ह भी कर लें तो चली जाती है उन में
बाहम दिल ओ दिलबर की लड़ाई नहीं जाती
ख़ुद दिल में चले आओगे जब क़स्द करोगे
ये राह बताने से बताई नहीं जाती
छुपती है 'जलाल' आँखों में कब हसरत-ए-दीदार
सौ पर्दे अगर हों तो छुपाई नहीं जाती
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