Jalal Lakhnavi

Top 10 of Jalal Lakhnavi

    जिसने कुछ एहसाँ किया इक बोझ सर पर रख दिया
    सर से तिनका क्या उतारा सर पे छप्पर रख दिया
    Jalal Lakhnavi
    9 Likes
    न हो बरहम जो बोसा बे-इजाज़त ले लिया मैं ने
    चलो जाने दो बेताबी में ऐसा हो ही जाता है
    Jalal Lakhnavi
    24 Likes
    पा-शिकस्तों को जब जब मिलेंगे आप
    सर-ए-राह-ए-तलब मिलेंगे आप

    उन से पूछा कि कब मिलेंगे आप
    बोले जब जाँ-ब-लब मिलेंगे आप

    दिल ये कह कर ख़बर को उस की चला
    मुझ को ज़िंदा न अब मिलेंगे आप

    अर्सा-ए-हश्र ईद-गाह हुआ
    सब से मिल लेंगे जब मिलेंगे आप

    वस्ल में भी जबीं पे होगी शिकन
    तोड़ने को ग़ज़ब मिलेंगे आप

    बे-ख़ुदों को तलाश से क्या काम
    हर जगह बे-तलब मिलेंगे आप

    छोड़ दी रुख़ पे ज़ुल्फ़ समझे हम
    छुप के एक आध शब मिलेंगे आप

    छेड़ मुतरिब तराना-ए-शब-ए-वस्ल
    साज़-ए-ऐश-ओ-तरब मिलेंगे आप

    यार जब मिल गया तो हम से 'जलाल'
    जो न मिलते थे सब मिलेंगे आप
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    0 Likes
    न ठेरी जब कोई तस्कीन-ए-दिल की शक्ल यारों में
    तो आ निकले तड़प कर हम तुम्हारे बे-क़रारों में

    किसी के इश्क़ में दर्द-ए-जिगर से दिल ये कहता है
    इधर भी आ निकलना हम भी हैं उम्मीदवारों में

    वो मातम बज़्म-ए-शादी है तुम्हारी जिस में शिरकत हो
    वो मरना ज़िंदगी है तुम जहाँ हो सोगवारों में

    तअ'ल्ली से ये नफ़रत है कि बा'द-ए-मर्ग ख़ाक अपनी
    अगर उठती भी है जा बैठती है ख़ाकसारों में

    हमारे दिल ने हम से बेवफ़ाई कर के क्या पाया
    वहाँ भी जा के ठहराया गया बे-ए'तिबारों में

    वो खींचूँगा 'जलाल' आहें कि उस की ख़ाक उड़ा देंगी
    फ़लक ने पीस डाला है समझ कर ख़ाकसारों में
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    0 Likes
    ऐ मुसव्विर जो मिरी तस्वीर खींच
    हसरत-आगीं ग़म-ज़दा दिल-गीर खींच

    जज़्ब भी कुछ ऐ तसव्वुर चाहिए
    ख़ुद खिंचे जिस शोख़ की तस्वीर खींच

    ऐ मोहब्बत दाग़-ए-दिल मुरझा न जाएँ
    इत्र इन फूलों का बे-ताख़ीर खींच

    आ बुतों में देख ज़ाहिद शान-ए-हक़
    दैर में चल नारा-ए-तकबीर खींच

    एक साग़र पी के बूढ़ा हो जवान
    वो शराब ऐ मय-कदे के पैर खींच

    दिल न उस बुत का दुखे कहता है इश्क़
    खींच जो नाला वो बे-तासीर खींच

    दिल इधर बेताब है तरकश उधर
    खींचता हूँ आह मैं तू तीर खींच

    कुछ तो काम आ हिज्र में ओ इज़्तिराब
    शोख़ी-ए-महबूब की तस्वीर खींच

    क़ैस से दश्त-ए-जुनूँ में कह 'जलाल'
    आगे आगे चल मिरे ज़ंजीर खींच
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    0 Likes
    सुब्ह हो शाम जुदाई की ये मुमकिन ही नहीं
    हिज्र की रात वो है जिस के लिए दिन ही नहीं

    सुब्ह करना शब-ए-ग़म का कभी मुमकिन ही नहीं
    आ के दिन फेर दे अपने वो कोई दिन ही नहीं

    दिल-ए-बे-ताब मोहब्बत को हो किस तरह सुकूँ
    दोनों हर्फ़ों में जब उस के कोई साकिन ही नहीं

    क्या मज़म्मत है मुझे सुब्ह-ए-शब-ए-हिज्र उन से
    जिन से कहता था कि बचना मिरा मुमकिन ही नहीं

    शब-ए-फ़ुर्क़त उसे मौत आ गई मेरे बदले
    दे अज़ाँ सुब्ह की कौन आज मोअज़्ज़िन ही नहीं

    बिस्तर-ए-ग़म से उठा कर ये बिठाता है हमें
    कोई जुज़ दर्द-ए-जिगर और मुआविन ही नहीं

    राह चलते भी ये पूछें कि किधर आ निकले
    जैसे हम कूचा-ए-महबूब के साकिन ही नहीं

    याद-ए-गेसू ने दिखाया है वो आलम हम को
    रात रहती है जहाँ आठ पहर दिन ही नहीं

    बंदा-ए-इशक़ हैं ईमान की कहते हैं 'जलाल'
    हम को काफ़िर जो समझता है वो मोमिन ही नहीं
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    0 Likes
    तसव्वुर हम ने जब तेरा किया पेश-ए-नज़र पाया
    तुझे देखा जिधर देखा तुझे पाया जिधर पाया

    कहाँ हम ने न इस दर्द-ए-निहानी का असर पाया
    यहाँ उट्ठा वहाँ चमका इधर आया उधर पाया

    पता उस ने दिया तेरा मिला जो इश्क़ में ख़ुद गुम
    ख़बर तेरी उसी से पाई जिस को बे-ख़बर पाया

    दिल-ए-बेताब के पहलू से जाते ही गया सब कुछ
    न पाईं सीने में आहें न आहों में असर पाया

    वो चश्म-ए-मुंतज़िर थी जिस को देखा आ के वा तुम ने
    वो नाला था हमारा जिस को सोते रात भर पाया

    मैं हूँ वो ना-तवाँ पिन्हाँ रहा ख़ुद आँख से अपनी
    हमेशा आप को गुम सूरत-ए-तार-ए-नज़र पाया

    हबीब अपना अगर देखा तो दाग़-ए-इश्क़ को देखा
    तबीब अपना अगर पाया तो इक दर्द-ए-जिगर पाया

    क्या गुम हम ने दिल को जुस्तुजू में दाग़-ए-हसरत की
    किसी को पा के खो बैठे किसी को ढूँढ कर पाया

    बहुत से अश्क-ए-रंगीं ऐ 'जलाल' इस आँख से टपके
    मगर बे-रंग ही देखा न कुछ रंग-ए-असर पाया
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    0 Likes
    जाने वाला इज़्तिराब-ए-दिल नहीं
    ये तड़प तस्कीन के क़ाबिल नहीं

    जान दे देना तो कुछ मुश्किल नहीं
    जान का ख़्वाहाँ मगर ऐ दिल नहीं

    तुझ से ख़ुश-चश्म और भी देखे मगर
    ये निगह ये पुतलियाँ ये तिल नहीं

    रहते हैं बे-ख़ुद जो तेरे इश्क़ में
    वो बहुत होश्यार हैं ग़ाफ़िल नहीं

    जो न सिसके वो तिरा कुश्ता है कब
    जो न तड़पे वो तिरा बिस्मिल नहीं

    हिज्र में दम का निकलना है मुहाल
    आप आ निकलें तो कुछ मुश्किल नहीं

    आइए हसरत-भरे दिल में कभी
    क्या ये महफ़िल आप की महफ़िल नहीं

    हम तो ज़ाहिद मरते हैं उस ख़ुल्द पर
    जो बहिश्तों में तिरे शामिल नहीं

    वो तो वो तस्वीर भी उस की 'जलाल'
    कहती है तुम बात के क़ाबिल नहीं
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    0 Likes
    वो दिल नसीब हुआ जिस को दाग़ भी न मिला
    मिला वो ग़म-कदा जिस में चराग़ भी न मिला

    गई थी कह के मैं लाती हूँ ज़ुल्फ़-ए-यार की बू
    फिरी तो बाद-ए-सबा का दिमाग़ भी न मिला

    चराग़ ले के इरादा था यार को ढूँडें
    शब-ए-फ़िराक़ थी कोई चराग़ भी न मिला

    ख़बर को यार की भेजा था गुम हुए ऐसे
    हवास-ए-रफ़्ता का अब तक सुराग़ भी न मिला

    'जलाल' बाग़-ए-जहाँ में वो अंदलीब हैं हम
    चमन को फूल मिले हम को दाग़ भी न मिला
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    1 Like
    क्यूँ वस्ल में भी आँख मिलाई नहीं जाती
    वो फ़र्क़ दिलों का वो जुदाई नहीं जाती

    क्या धूम भी नालों से मचाई नहीं जाती
    सोती हुई तक़दीर जगाई नहीं जाती

    कुछ शिकवा न करते न बिगड़ता वो शब-ए-वस्ल
    अब हम से कोई बात बनाई नहीं जाती

    देखो तो ज़रा ख़ाक में हम मिलते हैं क्यूँकर
    ये नीची निगह अब भी उठाई नहीं जाती

    कहती है शब-ए-हिज्र बहुत ज़िंदा रहोगे
    माँगा करो तुम मौत अभी आई नहीं जाती

    वो हम से मुकद्दर हैं तो हम उन से मुकद्दर
    कह देते हैं साफ़ अपनी सफ़ाई नहीं जाती

    हम सुल्ह भी कर लें तो चली जाती है उन में
    बाहम दिल ओ दिलबर की लड़ाई नहीं जाती

    ख़ुद दिल में चले आओगे जब क़स्द करोगे
    ये राह बताने से बताई नहीं जाती

    छुपती है 'जलाल' आँखों में कब हसरत-ए-दीदार
    सौ पर्दे अगर हों तो छुपाई नहीं जाती
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    2 Likes

Top 10 of Similar Writers