Jalal Lakhnavi

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Jalal Lakhnavi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jalal Lakhnavi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मैं ने पूछा कि है क्या शग़्ल तो हँसकर बोले आज कल हम तेरे मरने की दुआ करते हैं — Jalal Lakhnavi
न हो बरहम जो बोसा बे-इजाज़त ले लिया मैं ने चलो जाने दो बे-ताबी में ऐसा हो ही जाता है — Jalal Lakhnavi
जिस ने कुछ एहसाँ किया इक बोझ सर पर रख दिया सर से तिनका क्या उतारा सर पे छप्पर रख दिया — Jalal Lakhnavi

Ghazal

मिरी शाकी है ख़ुद मेरी फ़ुग़ाँ तक कि तालू से नहीं लगती ज़बाँ तक कोई हसरत ही ले आए मना कर मिरे रूठे हुए दिल को यहाँ तक जगह क्या दर्द की भी छीन लेगा जिगर का दाग़ फैलेगा कहाँ तक असर नालों में जो था वो भी खोया बहुत पछताए जा कर आसमाँ तक फ़लक तेरे जिगर के दाग़ हैं हम मिटाए जा मिटाना है जहाँ तक वो क्या पहलू में बैठे उठ गए क्या न लीं जल्दी में दो इक चुटकियाँ तक कोई माँगे तो आ कर मुंतज़िर है लिए थोड़ी सी जान इक नीम-जाँ तक उठाने से अजल के मैं न उठता वो आते तो कभी मुझ ना-तवाँ तक 'जलाल'-ए-नाला-कश चुपका न होगा वो दे कर देख लें मुँह में ज़बाँ तक — Jalal Lakhnavi
सद-शुक्र बुझ गई तिरी तलवार की हवस क़ातिल यही थी तेरे गुनहगार की हवस मुर्दे को भी मज़ार में लेने न देगी चैन ता-हश्र तेरे साया-ए-दीवार की हवस सौ बार आए ग़श अरिनी ही कहूँगा मैं मूसा नहीं कि फिर हो न दीदार की हवस रिज़वाँ कहाँ ये ख़ुल्द ओ इरम और मैं कहाँ आए थे ले के कूचा-ए-दिलदार की हवस सय्याद जब क़फ़स से निकाला था बहर-ए-ज़ब्ह पूछी तो होती मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार की हवस यूसुफ़ को तेरी चाह के सौदे की आरज़ू ईसा को तेरे इश्क़ के आज़ार की हवस दस्त-ए-हवा-ए-गुल में गरेबान है मिरा दामन जुनूँ में खींचती है ख़ार की हवस जब हो किसी का रिश्ता-ए-उल्फ़त गले का तौक़ दीवाना-पन है सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार की हवस माने है ज़ब्त चर्ख़ फुंके क्यूँँकर ऐ 'जलाल' किस तरह निकले आह-ए-शरर-बार की हवस — Jalal Lakhnavi
क्यूँँ वस्ल में भी आँख मिलाई नहीं जाती वो फ़र्क़ दिलों का वो जुदाई नहीं जाती क्या धूम भी नालों से मचाई नहीं जाती सोती हुई तक़दीर जगाई नहीं जाती कुछ शिकवा न करते न बिगड़ता वो शब-ए-वस्ल अब हम से कोई बात बनाई नहीं जाती देखो तो ज़रा ख़ाक में हम मिलते हैं क्यूँँकर ये नीची निगह अब भी उठाई नहीं जाती कहती है शब-ए-हिज्र बहुत ज़िंदा रहोगे माँगा करो तुम मौत अभी आई नहीं जाती वो हम से मुकद्दर हैं तो हम उन से मुकद्दर कह देते हैं साफ़ अपनी सफ़ाई नहीं जाती हम सुल्ह भी कर लें तो चली जाती है उन में बाहम दिल ओ दिलबर की लड़ाई नहीं जाती ख़ुद दिल में चले आओगे जब क़स्द करोगे ये राह बताने से बताई नहीं जाती छुपती है 'जलाल' आँखों में कब हसरत-ए-दीदार सौ पर्दे अगर हों तो छुपाई नहीं जाती — Jalal Lakhnavi
जफ़ा की उस से शिकायत ज़रा नहीं आती वो याद ही हमें शुक्र-ए-ख़ुदा नहीं आती निकल के ता-ब-लब आह-ए-रसा नहीं आती कराहता है जो अब दिल सदा नहीं आती हमारी ख़ाक की मिट्टी है क्या ख़राब ऐ चर्ख़ कभी इधर को उधर की हवा नहीं आती शब-ए-विसाल कहाँ ख़्वाब-ए-नाज़ का मौक़ा तुम्हारी नींद को आते हया नहीं आती अदू हमारी अयादत को ले के आए उन्हें कहाँ ये मर रही अब भी क़ज़ा नहीं आती लहद पे आए थे दो फूल भी चढ़ा जाते अभी तक आप में बू-ए-वफ़ा नहीं आती मिरी लहद को वो उन का ये कह कर ठुकराना सदा-ए-नारा-ए-सद-मर्हबा नहीं आती सितम है और मिरे दिल-शिकन का ये कहना शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा नहीं आती 'जलाल' हम ये न मानेंगे तू उसे नहीं याद तुझे कभी कोई हिचकी भी क्या नहीं आती — Jalal Lakhnavi
सुब्ह हो शाम जुदाई की ये मुमकिन ही नहीं हिज्र की रात वो है जिस के लिए दिन ही नहीं सुब्ह करना शब-ए-ग़म का कभी मुमकिन ही नहीं आ के दिन फेर दे अपने वो कोई दिन ही नहीं दिल-ए-बे-ताब मोहब्बत को हो किस तरह सुकूँ दोनों हर्फ़ों में जब उस के कोई साकिन ही नहीं क्या मज़म्मत है मुझे सुब्ह-ए-शब-ए-हिज्र उन से जिन से कहता था कि बचना मिरा मुमकिन ही नहीं शब-ए-फ़ुर्क़त उसे मौत आ गई मेरे बदले दे अज़ाँ सुब्ह की कौन आज मोअज़्ज़िन ही नहीं बिस्तर-ए-ग़म से उठा कर ये बिठाता है हमें कोई जुज़ दर्द-ए-जिगर और मुआविन ही नहीं राह चलते भी ये पूछें कि किधर आ निकले जैसे हम कूचा-ए-महबूब के साकिन ही नहीं याद-ए-गेसू ने दिखाया है वो आलम हम को रात रहती है जहाँ आठ पहर दिन ही नहीं बंदा-ए-इशक़ हैं ईमान की कहते हैं 'जलाल' हम को काफ़िर जो समझता है वो मोमिन ही नहीं — Jalal Lakhnavi
तसव्वुर हम ने जब तेरा किया पेश-ए-नज़र पाया तुझे देखा जिधर देखा तुझे पाया जिधर पाया कहाँ हम ने न इस दर्द-ए-निहानी का असर पाया यहाँ उट्ठा वहाँ चमका इधर आया उधर पाया पता उस ने दिया तेरा मिला जो इश्क़ में ख़ुद गुम ख़बर तेरी उसी से पाई जिस को बे-ख़बर पाया दिल-ए-बेताब के पहलू से जाते ही गया सब कुछ न पाईं सीने में आहें न आहों में असर पाया वो चश्म-ए-मुंतज़िर थी जिस को देखा आ के वा तुम ने वो नाला था हमारा जिस को सोते रात भर पाया मैं हूँ वो ना-तवाँ पिन्हाँ रहा ख़ुद आँख से अपनी हमेशा आप को गुम सूरत-ए-तार-ए-नज़र पाया हबीब अपना अगर देखा तो दाग़-ए-इश्क़ को देखा तबीब अपना अगर पाया तो इक दर्द-ए-जिगर पाया क्या गुम हम ने दिल को जुस्तुजू में दाग़-ए-हसरत की किसी को पा के खो बैठे किसी को ढूँढ़ कर पाया बहुत से अश्क-ए-रंगीं ऐ 'जलाल' इस आँख से टपके मगर बे-रंग ही देखा न कुछ रंग-ए-असर पाया — Jalal Lakhnavi
याद आ के तिरी हिज्र में समझाएगी किस को दिल ही नहीं सीने में तो बहलाएगी किस को दम खिंचता है क्यूँँ आज ये रग रग से हमारा क्या जाने इधर दिल की कशिश लाएगी किस को उठने ही नहीं देती है जब यास बिठा कर फिर शौक़ की हिम्मत कहीं ले जाएगी किस को जब मार ही डाला हमें बे-ताबी-ए-दिल ने करवट शब-ए-फ़ुर्क़त में बदलवाएगी किस को मर जाएँगे बे-मौत ग़म-ए-हिज्र के मारे आएगी तो अब ज़िंदा अजल पाएगी किस को अच्छा रहे तस्वीर किसी की मिरे दिल पर कम-बख़्त न ठहरेगा तो ठहराएगी किस को कुछ बैठ गया दिल ही यहाँ बैठ के अपना ग़ैरत तिरी महफ़िल से अब उठवाएगी किस को इस वादा-ख़िलाफ़ी ने अगर जान ही ले ली फिर झूटी तसल्ली तिरी तड़पाएगी किस को क्यूँँ लेंगे 'जलाल' आ के मिरे दिल में वो चुटकी झपकेगी पलक काहे को नींद आएगी किस को — Jalal Lakhnavi
न ठेरी जब कोई तस्कीन-ए-दिल की शक्ल यारों में तो आ निकले तड़प कर हम तुम्हारे बे-क़रारों में किसी के इश्क़ में दर्द-ए-जिगर से दिल ये कहता है इधर भी आ निकलना हम भी हैं उम्मीदवारों में वो मातम बज़्म-ए-शादी है तुम्हारी जिस में शिरकत हो वो मरना ज़िंदगी है तुम जहाँ हो सोगवारों में तअ'ल्ली से ये नफ़रत है कि बा'द-ए-मर्ग ख़ाक अपनी अगर उठती भी है जा बैठती है ख़ाकसारों में हमारे दिल ने हम से बे-वफ़ाई कर के क्या पाया वहाँ भी जा के ठहराया गया बे-ए'तिबारों में वो खींचूँगा 'जलाल' आहें कि उस की ख़ाक उड़ा देंगी फ़लक ने पीस डाला है समझ कर ख़ाकसारों में — Jalal Lakhnavi
मुद्दत के ब'अद मुँह से लगी है जो छूट कर तो ये भी मय पे गिरती है क्या टूट टूट कर मेहंदी था मेरा ख़ून कि होता जो राएगाँ इक शब के ब'अद हाथ से क़ातिल के छूट कर पहला ही दिन था हम को किए तर्क-ए-मय-कशी क्या क्या पड़ा है रात को मेंह टूट टूट कर सब्र ओ क़रार ले के दिया दाग़-ए-आरज़ू आबाद तुम ने दिल को किया मुझ को लूट कर हैरत है मेरे अख़्तर-ए-बख़्त-ए-सियाह को क्यूँँ कर गहन से चाँद निकलता है छूट कर अल्लाह-रे आँसुओं का खटकना फ़िराक़ में आँखों में भर गया कोई अल्मास कूट कर टपके नहीं क़लम के फ़क़त अश्क नामा पर वो कुछ लिखा कि रोई सियाही भी फूट कर कर बंद-ओ-बस्त अभी से न गुलशन में बाग़बाँ वो दिन तो हो कि मुर्ग़-ए-क़फ़स आएँ छूट कर सद-हैफ़ सर-गुज़िश्त जो अपनी कही 'जलाल' तू इस को दास्तान समझ सच को झूट कर — Jalal Lakhnavi
ऐ मुसव्विर जो मिरी तस्वीर खींच हसरत-आगीं ग़म-ज़दा दिल-गीर खींच जज़्ब भी कुछ ऐ तसव्वुर चाहिए ख़ुद खिंचे जिस शोख़ की तस्वीर खींच ऐ मोहब्बत दाग़-ए-दिल मुरझा न जाएँ इत्र इन फूलों का बे-ताख़ीर खींच आ बुतों में देख ज़ाहिद शान-ए-हक़ दैर में चल नारा-ए-तकबीर खींच एक साग़र पी के बूढ़ा हो जवान वो शराब ऐ मय-कदे के पैर खींच दिल न उस बुत का दुखे कहता है इश्क़ खींच जो नाला वो बे-तासीर खींच दिल इधर बेताब है तरकश उधर खींचता हूँ आह मैं तू तीर खींच कुछ तो काम आ हिज्र में ओ इज़्तिराब शोख़ी-ए-महबूब की तस्वीर खींच क़ैस से दश्त-ए-जुनूँ में कह 'जलाल' आगे आगे चल मिरे ज़ंजीर खींच — Jalal Lakhnavi
बे-बाक न देखा कोई क़ातिल के बराबर शर्म आँख में पाई न गई तिल के बराबर दुश्मन कोई ऐ यार मिरा और तिरा दोस्त होगा न ज़माने में मिरे दिल के बराबर दिल मुत्तसिल-ए-कूचा-ए-महबूब हुआ गुम लुटना था पहुँच कर मुझे मंज़िल के बराबर कम-बख़्ती-ए-वाइज़ है कि हो वाज़ की सोहबत रिन्दान-क़द्ह-नोश की महफ़िल के बराबर हम पी गए जो अश्क क़रीब-ए-मिज़ा आया कश्ती हुई जब ग़र्क़ तो साहिल के बराबर आहों के शरर गर्द नहीं दाग़-ए-जिगर के ताबिंदा हैं अख़्तर मह-ए-कामिल के बराबर पर्दा न उठा क़ैस ने लैला को न देखा झोंका भी न आया कोई महमिल के बराबर मक़्तल में ये हसरत रही ऐ ज़ोफ़ पस-ए-ज़ब्ह पहुँचे न तड़प कर किसी बिस्मिल के बराबर घर तक दर-ए-जानाँ से 'जलाल' आइए क्यूँँ कर एक एक क़दम है कई मंज़िल के बराबर — Jalal Lakhnavi
शब-ए-व'अदा है तू है और मैं हूँ हुजूम-ए-आरज़ू है और मैं हूँ दिल-ए-बेगाना-ख़ू है और मैं हूँ बग़ल में इक अदू है और मैं हूँ मिटाता ही रहा जिस को मुक़द्दर वो मेरी आरज़ू है और मैं हूँ परेशाँ-ख़ातिरी कहती है अपनी किसी की जुस्तुजू है और मैं हूँ शब-ए-तन्हाई-ए-फ़ुर्क़त में दिल से कुछ उस की गुफ़्तुगू है और मैं हूँ गुलिस्तान-ए-जहाँ है क़ाबिल-ए-सैर तिलिस्म-ए-रंग-ओ-बू है और मैं हूँ निगाह-ए-लुत्फ़-ए-दिलबर का है इज़हार फटे दिल का रफ़ू है और मैं हूँ कहीं छोड़ा अगर क़ातिल का दामन तू फिर मेरा लहू है और मैं हूँ 'जलाल' उस को बनाया उस ने दुश्मन क़यामत में अदू है और मैं हूँ — Jalal Lakhnavi
जाने वाला इज़्तिराब-ए-दिल नहीं ये तड़प तस्कीन के क़ाबिल नहीं जान दे देना तो कुछ मुश्किल नहीं जान का ख़्वाहाँ मगर ऐ दिल नहीं तुझ से ख़ुश-चश्म और भी देखे मगर ये निगह ये पुतलियाँ ये तिल नहीं रहते हैं बे-ख़ुद जो तेरे इश्क़ में वो बहुत होश्यार हैं ग़ाफ़िल नहीं जो न सिसके वो तिरा कुश्ता है कब जो न तड़पे वो तिरा बिस्मिल नहीं हिज्र में दम का निकलना है मुहाल आप आ निकलें तो कुछ मुश्किल नहीं आइए हसरत-भरे दिल में कभी क्या ये महफ़िल आप की महफ़िल नहीं हम तो ज़ाहिद मरते हैं उस ख़ुल्द पर जो बहिश्तों में तिरे शामिल नहीं वो तो वो तस्वीर भी उस की 'जलाल' कहती है तुम बात के क़ाबिल नहीं — Jalal Lakhnavi