paa-shikasto ko jab jab milenge aap | पा-शिकस्तों को जब जब मिलेंगे आप

  - Jalal Lakhnavi

पा-शिकस्तों को जब जब मिलेंगे आप
सर-ए-राह-ए-तलब मिलेंगे आप

उन से पूछा कि कब मिलेंगे आप
बोले जब जाँ-ब-लब मिलेंगे आप

दिल ये कह कर ख़बर को उस की चला
मुझ को ज़िंदा न अब मिलेंगे आप

अर्सा-ए-हश्र ईद-गाह हुआ
सब से मिल लेंगे जब मिलेंगे आप

वस्ल में भी जबीं पे होगी शिकन
तोड़ने को ग़ज़ब मिलेंगे आप

बे-ख़ुदों को तलाश से क्या काम
हर जगह बे-तलब मिलेंगे आप

छोड़ दी रुख़ पे ज़ुल्फ़ समझे हम
छुप के एक आध शब मिलेंगे आप

छेड़ मुतरिब तराना-ए-शब-ए-वस्ल
साज़-ए-ऐश-ओ-तरब मिलेंगे आप

यार जब मिल गया तो हम से 'जलाल'
जो न मिलते थे सब मिलेंगे आप

  - Jalal Lakhnavi

Dil Shayari

Our suggestion based on your choice

    आप चाहें तो कहीं और भी रह सकते हैं
    दिल हमारा है तो मर्ज़ी भी हमारी होगी
    Shamsul Hasan ShamS
    वही शागिर्द फिर हो जाते हैं उस्ताद ऐ 'जौहर'
    जो अपने जान-ओ-दिल से ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं
    Lala Madhav Ram Jauhar
    32 Likes
    दिल गया रौनक़-ए-हयात गई
    ग़म गया सारी काएनात गई
    Jigar Moradabadi
    33 Likes
    मैं जब सो जाऊँ इन आँखों पे अपने होंट रख देना
    यक़ीं आ जाएगा पलकों तले भी दिल धड़कता है
    Bashir Badr
    75 Likes
    हम तो बचपन में भी अकेले थे
    सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे
    Javed Akhtar
    45 Likes
    शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई
    दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई
    Faiz Ahmad Faiz
    35 Likes
    तिरंगा दिल में है लबों पे हिंदुस्तान रखता हूँ
    सिपाही हूँ हथेली पे मैं अपनी जान रखता हूँ
    Shashank Shekhar Pathak
    39 Likes
    उस के दिल की आग ठंडी पड़ गई
    मुझ को शोहरत मिल गई इल्ज़ाम से
    Siraj Faisal Khan
    20 Likes
    हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
    उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
    Bashir Badr
    49 Likes
    दिल हारने के बाद ही आता है ये सुख़न
    अब तक किसी ने कोख से शायर नहीं जना
    Anas Khan

More by Jalal Lakhnavi

As you were reading Shayari by Jalal Lakhnavi

    जफ़ा की उस से शिकायत ज़रा नहीं आती
    वो याद ही हमें शुक्र-ए-ख़ुदा नहीं आती

    निकल के ता-ब-लब आह-ए-रसा नहीं आती
    कराहता है जो अब दिल सदा नहीं आती

    हमारी ख़ाक की मिट्टी है क्या ख़राब ऐ चर्ख़
    कभी इधर को उधर की हवा नहीं आती

    शब-ए-विसाल कहाँ ख़्वाब-ए-नाज़ का मौक़ा
    तुम्हारी नींद को आते हया नहीं आती

    अदू हमारी अयादत को ले के आए उन्हें
    कहाँ ये मर रही अब भी क़ज़ा नहीं आती

    लहद पे आए थे दो फूल भी चढ़ा जाते
    अभी तक आप में बू-ए-वफ़ा नहीं आती

    मिरी लहद को वो उन का ये कह कर ठुकराना
    सदा-ए-नारा-ए-सद-मर्हबा नहीं आती

    सितम है और मिरे दिल-शिकन का ये कहना
    शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा नहीं आती

    'जलाल' हम ये न मानेंगे तू उसे नहीं याद
    तुझे कभी कोई हिचकी भी क्या नहीं आती
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    दे सनम हुक्म तू दर पर तिरे हाज़िर हो कर
    पड़ रहे कोई मुसलमान भी काफ़िर हो कर

    चुटकियाँ लेने को बस रह चुके पिन्हाँ दिल में
    कभी पहलू में भी आ बैठिए ज़ाहिर हो कर

    जब्हा-साई का इरादा हो तो पहुँचा देगा
    दर तक उस बुत के ख़ुदा हफ़िज़-ओ-नासिर हो कर

    ग़ैर क्यों हम को उठाता है तिरी महफ़िल से
    आप उठ जाएँगे बरख़ास्ता-ख़तिर हो कर

    ढूँडते रह गए पहलू ही तअ'ज्जुब है 'जलाल'
    हाल-ए-दिल उस ने न तुम कह सके शाइ'र हो कर
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    मिरी शाकी है ख़ुद मेरी फ़ुग़ाँ तक
    कि तालू से नहीं लगती ज़बाँ तक

    कोई हसरत ही ले आए मना कर
    मिरे रूठे हुए दिल को यहाँ तक

    जगह क्या दर्द की भी छीन लेगा
    जिगर का दाग़ फैलेगा कहाँ तक

    असर नालों में जो था वो भी खोया
    बहुत पछताए जा कर आसमाँ तक

    फ़लक तेरे जिगर के दाग़ हैं हम
    मिटाए जा मिटाना है जहाँ तक

    वो क्या पहलू में बैठे उठ गए क्या
    न लीं जल्दी में दो इक चुटकियाँ तक

    कोई माँगे तो आ कर मुंतज़िर है
    लिए थोड़ी सी जान इक नीम-जाँ तक

    उठाने से अजल के मैं न उठता
    वो आते तो कभी मुझ ना-तवाँ तक

    'जलाल'-ए-नाला-कश चुपका न होगा
    वो दे कर देख लें मुँह में ज़बाँ तक
    Read Full
    Jalal Lakhnavi
    मैंने पूछा कि है क्या शग़्ल तो हँसकर बोले
    आज कल हम तेरे मरने की दुआ करते हैं
    Jalal Lakhnavi
    13 Likes
    सुब्ह हो शाम जुदाई की ये मुमकिन ही नहीं
    हिज्र की रात वो है जिस के लिए दिन ही नहीं

    सुब्ह करना शब-ए-ग़म का कभी मुमकिन ही नहीं
    आ के दिन फेर दे अपने वो कोई दिन ही नहीं

    दिल-ए-बे-ताब मोहब्बत को हो किस तरह सुकूँ
    दोनों हर्फ़ों में जब उस के कोई साकिन ही नहीं

    क्या मज़म्मत है मुझे सुब्ह-ए-शब-ए-हिज्र उन से
    जिन से कहता था कि बचना मिरा मुमकिन ही नहीं

    शब-ए-फ़ुर्क़त उसे मौत आ गई मेरे बदले
    दे अज़ाँ सुब्ह की कौन आज मोअज़्ज़िन ही नहीं

    बिस्तर-ए-ग़म से उठा कर ये बिठाता है हमें
    कोई जुज़ दर्द-ए-जिगर और मुआविन ही नहीं

    राह चलते भी ये पूछें कि किधर आ निकले
    जैसे हम कूचा-ए-महबूब के साकिन ही नहीं

    याद-ए-गेसू ने दिखाया है वो आलम हम को
    रात रहती है जहाँ आठ पहर दिन ही नहीं

    बंदा-ए-इशक़ हैं ईमान की कहते हैं 'जलाल'
    हम को काफ़िर जो समझता है वो मोमिन ही नहीं
    Read Full
    Jalal Lakhnavi

Similar Writers

our suggestion based on Jalal Lakhnavi

Similar Moods

As you were reading Dil Shayari Shayari