mirii shaaki hai KHud mirii fugaan tak | मिरी शाकी है ख़ुद मेरी फ़ुग़ाँ तक

  - Jalal Lakhnavi

मिरी शाकी है ख़ुद मेरी फ़ुग़ाँ तक
कि तालू से नहीं लगती ज़बाँ तक

कोई हसरत ही ले आए मना कर
मिरे रूठे हुए दिल को यहाँ तक

जगह क्या दर्द की भी छीन लेगा
जिगर का दाग़ फैलेगा कहाँ तक

असर नालों में जो था वो भी खोया
बहुत पछताए जा कर आसमाँ तक

फ़लक तेरे जिगर के दाग़ हैं हम
मिटाए जा मिटाना है जहाँ तक

वो क्या पहलू में बैठे उठ गए क्या
न लीं जल्दी में दो इक चुटकियाँ तक

कोई माँगे तो आ कर मुंतज़िर है
लिए थोड़ी सी जान इक नीम-जाँ तक

उठाने से अजल के मैं न उठता
वो आते तो कभी मुझ ना-तवाँ तक

'जलाल'-ए-नाला-कश चुपका न होगा
वो दे कर देख लें मुँह में ज़बाँ तक

  - Jalal Lakhnavi

Gham Shayari

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