Kaif Ahmad Siddiqui

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Kaif Ahmed Siddiqui shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kaif Ahmed Siddiqui's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Ghazal

ये पीली शाख़ पर बैठे हुए पीले परिंदे लरज़ती धूप की आग़ोश में सह में परिंदे ख़ुदा मालूम किस आवाज़ के प्यासे परिंदे वो देखो ख़ामुशी की झील में उतरे परिंदे मिरे कमरे की वीरानी से उकताए परिंदे सुलगती दोपहर में किस तरफ़ जाते परिंदे हिसार-ए-जिस्म से घबरा के जब निकले परिंदे हवा की ज़द में आ कर देर तक चीख़े परिंदे ख़ुद अपने शोला-ए-पर्वाज़ से जलते परिंदे ख़ला-ए-यख़-ज़दा में रह के भी सुलगे परिंदे मिरे दस्त-ए-हवस-आलूद से उड़ते परिंदे किसी शाख़-ए-जवानी तक नहीं पहुँचे परिंदे अज़ल से इक हसीं ख़ुशबू के दीवाने परिंदे अबद तक 'कैफ़' दश्त-ए-रंग में भटके परिंदे — Kaif Ahmad Siddiqui
हम आज कुछ हसीन सराबों में खो गए आँखें खुलीं तो जागते ख़्वाबों में खो गए हम सफ़्हा-ए-हयात से जब बे-निशाँ हुए लफ़्ज़ों की रूह बन के किताबों में खो गए आईना-ए-बहार के कुछ अक्स-ए-मुज़्महिल ख़ुशबू का रंग पा के गुलाबों में खो गए दर-अस्ल बर्शगाल के तुम आफ़्ताब थे बरसात जब हुई तो सहाबों में खो गए निकले थे जो भी आज तलाश-ए-सवाब में वो ज़िंदगी के सख़्त अज़ाबों में खो गए दिल को थी एक शहर-ए-तमन्ना की जुस्तुजू लेकिन हम आरज़ू के ख़राबों में खो गए जब मसअला हयात का कुछ हल न हो सका हम 'कैफ़' फ़लसफ़े की किताबों में खो गए — Kaif Ahmad Siddiqui
दुनिया में कुछ अपने हैं कुछ बेगाने अल्फ़ाज़ किस को इतनी फ़ुर्सत है जो पहचाने अल्फ़ाज़ रेग-ए-अलामत में भी जल कर पा न सके मफ़्हूम सहरा-ए-मअ'नी में भी भटके अनजाने अल्फ़ाज़ दश्त-ए-अज़ल से दश्त-ए-अबद तक छान चुका में ख़ाक और कहाँ ले जाएँगे अब भटकाने अल्फ़ाज़ बे-म'अनी माहौल में रह कर ज़ेहन हुआ माऊफ़ मुझ को भी पागल कर देंगे दीवाने अल्फ़ाज़ अक्सर आधी रात में ले कर कुछ पथरीले ख़्वाब शीशा-ए-ज़ेहन से आ जाते हैं टकराने अल्फ़ाज़ शेर-ओ-सुख़न के मय-ख़ाने का मैं हूँ इक मय-ख़्वार मेरे लिए बादा है तख़य्युल पैमाने अल्फ़ाज़ 'कैफ़' कभी इक शे'र में ढलना होता है दुश्वार और कभी ख़ुद बन जाते हैं अफ़्साने अल्फ़ाज़ — Kaif Ahmad Siddiqui
हो गए नाकाम तो पछताएँ क्या दोस्तों के सामने शरमाएँ क्या हो रहे हैं फ़ेल हम दो साल से घर में जा कर अपना मुँह दिखलाएँ क्या जब किसी सूरत नहीं इस से मफ़र इम्तिहाँ के नाम से घबराएँ क्या याद कर लें आज थोड़ा सा सबक़ मास्टर साहब के डंडे खाएँ क्या जब गुरु जी ख़ुद नहीं समझे सवाल अपने शागिर्दों को वो समझाएँ क्या पढ़ नहीं सकते तो शैतानी करें आ गए स्कूल में तो जाएँ क्या आओ हम आपस में कुछ झगड़ा करें खेल से अब अपना दिल बहलाएँ क्या पूछते हैं मास्टर हम कौन हैं कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या जब कहीं ज़ौक़-ए-सुख़न-फ़हमी नहीं 'कैफ़' साहब की ग़ज़ल हम गाएँ क्या — Kaif Ahmad Siddiqui
नाम लिखा लिया तो फिर करते हो हाए हाए क्यूँ पढ़ना न था तुम्हें अगर दर्जे में पढ़ने आए क्यूँ क्यूँँकर हम इम्तिहान दें सोएँगे जा के बाग़ में पढ़ने को आधी रात तक कोई हमें जगाए क्यूँ बैठे हैं अपनी सीट पर कैसे भगाएँ मास्टर आए हैं दे के फ़ीस हम कोई हमें भगाए क्यूँ चीख़ेंगे ख़ूब हम यहाँ चाहे ख़फ़ा हों मेहमाँ नफ़रत हो जिस को शोर से घर में हमारे आए क्यूँ कोई पड़ोसी तंग हो चाहे किसी से जंग हो घर है ये अपने बाप का कोई हमें चुपाए क्यूँ काना ख़ुदा ने कर दिया इस में है अपनी क्या ख़ता गाली बकेंगे ख़ूब हम कोई हमें चिड़ाए क्यूँ देखो तो पेट बन गया आख़िर ग़ुबारा गैस का खाते हो इतना गोश्त क्यूँ पीते हो इतनी चाय क्यूँ साथी हों या असातिज़ा आए किसी को क्या मज़ा दर्जे में कोई बे-महल 'कैफ़' की ग़ज़लें गाए क्यूँ — Kaif Ahmad Siddiqui
सारे दिन दश्त-ए-तजस्सुस में भटक कर सो गया शाम की आग़ोश में सूरज भी थक कर सो गया आख़िर-ए-शब मैं भी खा कर ख़्वाब-आवर गोलियाँ चंद लम्हे नश्शा-ए-ग़म से बहक कर सो गया ये सुकूत-ए-शाम ये हंगामा-ए-ज़ेहन-ए-बशर रूह है बेदार लेकिन जिस्म थक कर सो गया आख़िर इस दौर-ए-पुर-आशोब का हर आदमी ख़्वाब-ए-मुस्तक़बिल के जंगल में भटक कर सो गया चंद दिन गुलशन में नग़मात-ए-मसर्रत छेड़ कर शाख़-ए-ग़म पर रूह का पंछी चहक कर सो गया आख़िरश सारे चमन को दे के हुस्न-ए-ज़िंदगी मौत के बिस्तर पे हर ग़ुंचा महक कर सो गया ज़िंदगी भर अब अँधेरी रात में है जागना अब तो क़िस्मत का सितारा भी चमक कर सो गया पैकर-ए-अल्फ़ाज़ में इक आग दहकाता हुआ काग़ज़ी सहरा में इक शो'ला भड़क कर सो गया 'कैफ़' यूँँ आग़ोश-ए-फ़न में ज़ेहन को नींद आ गई जैसे माँ की गोद में बच्चा सिसक कर सो गया — Kaif Ahmad Siddiqui
सूरज आँखें खोल रहा है सूखे हुए दरख़्तों में साए राख बने जाते हैं जीते हुए दरख़्तों में आज कुछ ऐसे शो'ले भड़के बारिश के हर क़तरे से धूप पनाहें माँग रही है भीगे हुए दरख़्तों में ख़ामोशी भी ख़ौफ़-ज़दा है आसेबी आवाज़ों से सन्नाटे भी काँप रहे हैं सह में हुए दरख़्तों में तन्हाई की दुल्हन अपनी माँग सजाए बैठी है वीरानी आबाद हुई है उजड़े हुए दरख़्तों में आज तो सारे बाग़ में ख़्वाब-ए-मर्ग का नश्शा तारी है लेकिन कोई जाग रहा है सोए हुए दरख़्तों में कौन मुसीबत के आम में साथ किसी का देता है चंद परिंदे चीख़ रहे हैं गिरते हुए दरख़्तों में — Kaif Ahmad Siddiqui
रोज़ मुर्ग़ा बना करे कोई कब तक आख़िर पिटा करे कोई जब कहीं नौकरी नहीं मिलती डिग्रियाँ ले के क्या करे कोई मुझ को रीडिंग से सख़्त नफ़रत है मैं सुनूँ और पढ़ा करे कोई जिस में आती हो बू तअ'स्सुब की ऐसी तारीख़ क्या करे कोई जिन में जंग-ओ-जदल के क़िस्से हों वो कुतुब क्यूँ पढ़ा करे कोई ग़ैर-मुल्की ज़बान इंग्लिश को ख़्वा-मख़्वाह क्यूँ रटा करे कोई नहीं उम्मीद-ए-कामयाबी जब इम्तिहाँ दे के क्या करे कोई ख़ूब इंसाफ़ है कि दर्जे में मैं पिटूँ और ख़ता करे कोई कब तक आख़िर बग़ैर समझे हुए फ़ार्मूले रटा करे कोई 'कैफ़' आता नहीं जवाब-ए-ख़ुदा ख़त कहाँ तक लिखा करे कोई — Kaif Ahmad Siddiqui
मुझे नक़्ल पर भी इतना अगर इख़्तियार होता कभी फ़ेल इम्तिहाँ में न मैं बार बार होता जो मैं फ़ेल हो गया तो सभी दे रहे हैं ता'ने कोई दिल-नवाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता मुझे आज इतनी नफ़रत से न देखती ये दुनिया जो पढ़ाई से ज़रा भी मिरे दिल को प्यार होता मिरे मास्टर न होते जो उलूम-ओ-फ़न में दाना कभी मौला-बख़्श-साहब का न मैं शिकार होता वो पढ़ाते वक़्त दर्जे में हज़ार बार बरसे जो मुझे भी छींक आती उन्हें नागवार होता न मैं तंदुरुस्त होता न कभी स्कूल जाता कभी सर में दर्द रहता तो कभी बुख़ार होता कभी मदरसे में आता कोई ऐसा चाट वाला कि जो मुफ़्त में खिलाता न कभी उधार होता ये गधा जो अपनी ग़फ़्लत से है बेवक़ूफ़ इतना जो ये ख़ुद को जान जाता बड़ा होशियार होता तिरे घर में 'कैफ़' तेरा कोई क़द्र-दाँ नहीं है जो वतन से दूर होता तो बड़ा वक़ार होता — Kaif Ahmad Siddiqui
मुझ को ता'लीम से नफ़रत ही सही और खेलों से मोहब्बत ही सही मैं ने इस से तो बड़े काम लिए आप को खेल से वहशत ही सही इम्तिहाँ से मैं नहीं घबराता फ़ेल होना मिरी क़िस्मत ही सही पढ़ने वालों ने भी क्या कुछ न किया नक़्ल करना मिरी आदत ही सही मैं ने तो सिर्फ़ गुज़ारिश की थी सब की नज़रों में शिकायत ही सही मैं किसी से न लड़ूँगा हरगिज़ दब के रहना मिरी फ़ितरत ही सही मैं न छोड़ूँगा शराफ़त का चलन ये शराफ़त मिरी ज़िल्लत ही सही कभी चूमेगी क़दम ख़ुद मंज़िल आज हर गाम पे दिक़्क़त ही सही ये मुसीबत भी बड़ी दिलकश है ज़िंदगी एक मुसीबत ही सही 'कैफ़' इक दिन ये बना देगी तुझे शेर-गोई तिरी आदत ही सही — Kaif Ahmad Siddiqui
क़िस्सा-ए-नक़्ल कुछ ऐसा है बताए न बने बात बिगड़ी है कुछ ऐसी कि बनाए न बने इम्तिहाँ हाल में हम लाए हैं इक ऐसी किताब मुम्तहिन पूछे ये क्या है तो छुपाए न बने इन किताबों से है पीछा भी छुड़ाना मुश्किल और ये बोझ भी अब हम से उठाए न बने क्या करें खेल में कम-बख़्त कशिश है ऐसी जिस से दिल अपना हटाएँ तो हटाए न बने सुब्ह को आँख भी खुलती नहीं जल्दी अपनी देर हो जाए तो स्कूल भी जाए न बने घर से भी सेनिमा जाने की इजाज़त न मिली और स्कूल से भी भाग के आए न बने 'कैफ़' ख़ामोश रहा भी नहीं जाता मुझ से और दर्जे में ग़ज़ल गाएँ तो गाए न बने — Kaif Ahmad Siddiqui
क्या जाने कितने ही रंगों में डूबी है रंग बदलती दुनिया में जो यक-रंगी है मंज़र मंज़र ढलता जाता है पीला-पन चेहरा चेहरा सब्ज़ उदासी फैल रही है पीली साँसें भूरी आँखें सुर्ख़ निगाहें उन्नाबी एहसास तबीअत तारीख़ी है देख गुलाबी सन्नाटों में रहने वाले आवाज़ों की ख़ामोशी कितनी काली है आज सफ़ेदी भी काला मल्बूस पहन कर अपनी चमकती रंगत का मातम करती है सारी ख़बरों में जैसे इक ज़हर भरा है आज अख़बारों की हर सुर्ख़ी नीली है 'कैफ़' कहाँ तक तुम ख़ुद को बे-दाग़ रख्खोगे अब तो सारी दुनिया के मुँह पर स्याही है — Kaif Ahmad Siddiqui

Nazm

लो घंटा बजा इंटरवल का अब वक़्त आया है हलचल का अब जो चाहे वो शोर करे अब हर लड़का ख़ुद टीचर है जिस चीज़ को पाया तोड़ दिया हाथों में सब के सनीचर है गो आज का दिन है मंगल का लो घंटा बजा इंटरवल का देखो इक छोटे बच्चे से वो छीन रहा है लंच कोई कुर्सी को पटख़ कर कुर्सी पर वो फेंक रहा है बेंच कोई स्कूल बना घर पागल का लो घंटा बजा इंटरवल का कुछ अपनी सेहत पर नाज़ाँ गामा की तरह से अकड़ते हैं कुछ ताल ठोंक कर मैदाँ में रुस्तम की तरह से लड़ते हैं हर सम्त है मंज़र दंगल का लो घंटा बजा इंटरवल का कुछ मौसीक़ी के मतवाले कुछ फ़िल्मी गाने गाते हैं कुछ मीर के शे'रों के रसिया कुछ क़ौमी तराने गाते हैं कुछ क़िस्सा आल्हा ऊदल का लो घंटा बजा इंटरवल का कुछ चाट की दूकानों में खड़े पत्तों में कचालू खाते हैं कुछ गर्म पकोड़ी के तालिब कुछ ताज़ा आलू खाते हैं कुछ पापड़ खाते हैं कल का लो घंटा बजा इंटरवल का कुछ दौलत-मंदों के लड़के खाते हैं अपनी बिरयानी कुछ भूके मुफ़्लिस बच्चों के मुँह में भर आता है पानी है शौक़ किसी को चावल का लो घंटा बजा इंटरवल का इस नीम के नीचे मैदाँ में मौसम है जहाँ ठंडा ठंडा इक गिरोह खिलाड़ी लड़कों का है खेल रहा गिली डंडा ये लुत्फ़ है बस पल दो पल का लो घंटा बजा इंटरवल का — Kaif Ahmad Siddiqui
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे ये माना चाँद अभी इक रेत का मैदान है लेकिन किसी दिन जा के हम इस को हसीं जन्नत बनाएँगे किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे ये माना चाँद पर इस वक़्त आबादी नहीं लेकिन किसी दिन हम वहाँ जा कर नई बस्ती बसाएँगे किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे ये माना चाँद अभी बद-सूरत-ओ-बद-शक्ल है लेकिन किसी दिन हम उसे दुनिया से भी दिलकश बनाएँगे किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे ये माना चाँद पर हर सम्त हैं ज्वाला-मुखी लेकिन किसी दिन हम वहाँ पर प्यार की कलियाँ खिलाएँगे किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे ये माना चाँद अंदर से बहुत तारीक है लेकिन किसी दिन हम वहाँ पर अम्न की शमएँ जलाएँगे किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे ये माना चाँद पर हर सम्त हैं वीरानियाँ लेकिन किसी दिन हम वहाँ जा कर बहुत धू में मचाएँगे किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे ये माना चाँद पर जाना अभी बे-कार है लेकिन वो दिन भी आएगा जब हम वहाँ पिकनिक मनाएँगे किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे — Kaif Ahmad Siddiqui
वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी हर एक फ़र्द के हमदर्द ग़म-गुसार-ए-वतन सदाक़तों के परस्तार झूट के दुश्मन निज़ाम-ए-अम्न के रूह-ए-रवाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी वो एकता के पुजारी हर एक के भाई वो फ़ख़्र-ए-क़ौम वो इंसानियत के शैदाई ज़मीं पे रह के भी इक आसमाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी कली कली को तबस्सुम का एक ढंग दिया हर एक फूल को अपने लहू का रंग दिया बहार-ए-गुलशन-ए-अम्न-ओ-अमाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी हर एक दिल में जलाया चराग़-ए-आज़ादी है जिन के ख़ून से शादाब बाग़-ए-आज़ादी हमारे मुल्क के वो बाग़बाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी सुनी न बात तशद्दुद भरे उसूलों की महक लुटाई अहिंसा के नर्म फूलों की ख़ुलूस-ओ-इज्ज़ के इक गुलिस्ताँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी — Kaif Ahmad Siddiqui
सोचता हूँ वक़्त की गर्दन पकड़ कर रेशमी स्कार्फ़ का फंदा लगा कर खींच लूँ और इतनी ज़ोर से चीख़ूँ ज़मीं से आसमाँ तक सिर्फ़ मेरी चीख़ ही का शोर गूँजे वक़्त की मरती हुई आवाज़ कोई सुन न पाए सोचता हूँ वुसअत-ए-आफ़ाक़ में परवाज़ कर के रात की आँखों में तारीकी का पर्दा डाल कर मैं चाँद तारों को चुरा लाऊँ ज़मीं पर और थोड़ी देर बच्चों की तरह ख़ुश हो के खेलूँ खेलने से भी जब अपना दिल न बहले एक पत्थर पर पटख़ कर हर खिलौने को मैं चकना-चूर कर दूँ सोचता हूँ आसमाँ से छीन कर जलते हुए सूरज की थाली एक कश्ती की तरह गहरे समुंदर में चलाऊँ और उस पर सारी दुनिया को बिठा कर ग़र्क़ कर दूँ सोचता हूँ सोचते ही सोचते मैं ख़ुद ही इक दिन सोच के आतिश-कदा में जल न जाऊँ — Kaif Ahmad Siddiqui
सारे वतन के राज दुलारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे भारत माँ की आँख के तारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे बुनियादी ता'लीम के बानी हुब्ब-ए-वतन की ज़िंदा कहानी इल्म के दरिया अम्न के धारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे मा'मूली उस्ताद से बढ़ कर बन गए सारे मुल्क के रहबर ग़म से कभी हिम्मत ही न हारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे देख के तेरी जेहद-ए-मुसलसल छट गए ख़ुद ही दुख के बादल फूल बने ग़म के अंगारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे गाँधी जी के राज़ के महरम और जवाहर लाल के हमदम अम्न-ओ-अमाँ के पालन-हारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे आज़ादी के दीप जलाए तू ने वतन से दूर भगाए अहद-ए-ग़ुलामी के अँधियारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे मुश्तरका तहज़ीब के मज़हर इज्ज़-ओ-ख़ुलूस अख़्लाक़ के पैकर सब की उम्मीदों के सहारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे तू है वतन का रहबर सच्चा क्यूँ न वतन का बच्चा बच्चा नाम तिरा इज़्ज़त से पुकारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर पियारे — Kaif Ahmad Siddiqui
आग़ोश-ए-वालिदा में पाला था हम को जिस ने इक पैकर-ए-अदब में ढाला था हम को जिस ने जिस ने है इब्तिदास हर ज़िंदगी सँवारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी बचपन में जिस ने मीठी लोरी सुनाई हम को जिस के तुफ़ैल झूले में नींद आई हम को रस घोलती है जिस की आवाज़ प्यारी प्यारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी जिस की मदद से हम ने अपनी ज़बान खोली जिस में समा गई है सारे जहाँ की बोली जिस की हर इक सिफ़त है सौ ख़ूबियों पे भारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी जिस से मिटा जहालत की रात का अँधेरा हिन्दोस्ताँ में चमका तहज़ीब का सवेरा है जिस की रौशनी का हर घर में फ़ैज़ जारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी वो 'कृष्ण' हों कि 'बेदी' 'चकबस्त' हों कि 'तालिब' 'महरूम' हों कि 'हाली' 'इक़बाल' हों कि 'ग़ालिब' सदियों हर अहल-ए-मज़हब जिस का रहा पुजारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी जिस ने ख़ुलूस-ए-दिल से ऐ 'कैफ़' सब को पाला जिस का हर एक घर में अब भी है बोल-बाला दुश्मन के भी दिलों पर है जिस का ख़ौफ़ तारी वो मादरी ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारी — Kaif Ahmad Siddiqui
सारी दुनिया में ला-जवाब बनो इंतिख़ाबों का इंतिख़ाब बनो अम्न-ओ-इंसानियत की आब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो तुम हो हिन्दोस्ताँ के मुस्तक़बिल तुम से रौशन हो जादा-ए-मंज़िल आरज़ूओं के माहताब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो कामयाबी की शाह-राहों में मादर-ए-हिन्द की निगाहों में जगमगाते हसीन ख़्वाब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो दूर दुनिया से तीरगी कर दो सारे आलम में रौशनी कर दो इल्म-ओ-हिकमत के आफ़्ताब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो तुम से दुनिया में शांति फैले मुर्दा क़ौमों में ज़िंदगी फैले अपने मक़्सद में कामयाब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिंद के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो — Kaif Ahmad Siddiqui
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब ता'लीम न होगी जिस में कभी सब आज़ादी से घू मेंगे उस्ताद पढ़ेंगे दर्जों में हम लोग ख़ुशी से घू मेंगे स्कूल न जा कर बाग़ों में तफ़रीह करेंगे बे-मतलब हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब पढ़ने के लिए बच्चों को जहाँ मुर्ग़ा न बनाया जाएगा चाँटे न जमाए जाएँगे डंडों से न पीटा जाएगा उस्ताद के मौला-बख़्श जहाँ दिखला न सकेंगे कुछ कर्तब हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब जो याद करेगा ख़ूब सबक़ ता-उम्र न होगा पास वही जो खेल में लेगा दिलचस्पी पढ़ने में न होगा फ़ेल कभी दर-अस्ल हमारे मकतब का होगा हर इक दस्तूर अजब हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब जिस दिन भी पड़ा बीमार कोई स्कूल में होगा हॉलीडे दो बूँद भी पानी बरसा तो हो जाएगा फ़ौरन रेनी डे हफ़्ते में तो कम से कम छे दिन इतवार मनाएँगे हम सब हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब खेलेंगे कभी जब हम क्रिकेट तो ख़ूब उड़ाएँगे छक्के हॉकी में दिखाएँगे वो हुनर रह जाएँगे सब हक्के-बक्के हर टीम से मैचें जीतेगा हम लोगों का फूटबाल क्लब हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब — Kaif Ahmad Siddiqui
कितनी मेहनत से पढ़ाते हैं हमारे उस्ताद हम को हर इल्म सिखाते हैं हमारे उस्ताद तोड़ देते हैं जहालत के अँधेरों का तिलिस्म इल्म की शम्अ' जलाते हैं हमारे उस्ताद मंज़िल-ए-इ'ल्म के हम लोग मुसाफ़िर हैं मगर रास्ता हम को दिखाते हैं हमारे उस्ताद ज़िंदगी नाम है काँटों के सफ़र का लेकिन राह में फूल बिछाते हैं हमारे उस्ताद दिल में हर लम्हा तरक़्क़ी की दुआ करते हैं हम को आगे ही बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद सब को तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का सबक़ देते हैं हम को इंसान बनाते हैं हमारे उस्ताद हम को देते हैं ब-हर-लम्हा पयाम-ए-ता'लीम अच्छी बातें ही बताते हैं हमारे उस्ताद ख़ुद तो रहते हैं बहुत तंग-ओ-परेशान मगर दौलत-ए-इल्म लुटाते हैं हमारे उस्ताद हम पे लाज़िम है कि हम लोग करें उन का अदब किस मोहब्बत से बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद — Kaif Ahmad Siddiqui
नतीजा सुन के कई लोग बद-हवा से हुए ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए सिला मिला है हमें साल भर की मेहनत का चमक रहा है सितारा हमारी क़िस्मत का यही तो वक़्त मिला है हमें मसर्रत का जो फ़ेल हो गए वो किस क़दर उदास हुए ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए वो इम्तिहान में रातों को जाग कर पढ़ना वो नींद आँखों में छाई हुई मगर पढ़ना वो आधी रात से बिस्तर पे ता-सहर पढ़ना ज़हे-नसीब वो लम्हात हम को रास हुए ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए जो खेल-कूद में दिन-रात चूर रहते थे हर एक खेल में शामिल ज़रूर रहते थे जो सुब्ह-ओ-शाम किताबों से दूर रहते थे जहाँ में आज वही मुब्तला-ए-यास हुए ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए जिन्हें था अपनी लियाक़त पे ए'तिबार बहुत जिन्हें ख़ुद अपने क़लम पर था इख़्तियार बहुत जो अपने आप को समझे थे होशियार बहुत उन्हीं के होश उड़े और गुम हवा से हुए ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए — Kaif Ahmad Siddiqui
मिरी गुड़िया किसी दिन चाँद पर शादी रचाएगी ज़मीं के तो सभी गुड्डे नज़र आते हैं अब बुड्ढे बहुत ही ख़ूब-सूरत नौजवाँ हैं चाँद के गुड्डे उन्हीं में से किसी के घर मिरी गुड़िया भी जाएगी मिरी गुड़िया किसी दिन चाँद पर शादी रचाएगी फ़रिश्ते आसमानों से बराती बन के आएँगे सितारे रास्ते में नूर की चादर बिछाएँगे ख़ुशी से झूम कर हर हूर शहनाई बजाएगी मिरी गुड़िया किसी दिन चाँद पर शादी रचाएगी हसीं किरनों से रौशन चाँदनी की पालकी होगी ज़मीं से आसमाँ तक रौशनी ही रौशनी होगी मिरी गुड़िया जब अपने घर से रुख़्सत हो के जाएगी मिरी गुड़िया किसी दिन चाँद पर शादी रचाएगी नज़र आएगी जब उस को मिरी प्यारी सी ये गुड़िया बलाएँ पर बलाएँ लेगी बढ़ कर चाँद की बुढ़िया दुल्हन को देख कर दूल्हे की क़िस्मत जगमगाएगी मिरी गुड़िया किसी दिन चाँद पर शादी रचाएगी — Kaif Ahmad Siddiqui
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले इक साथ रह के कैसा बचपन गुज़र रहा था कितनी ख़ुशी से अपना जीवन गुज़र रहा था किस काम का ये पढ़ना जो दोस्ती से खेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले वो तेरे साथ जा कर गलियों की सैर करना स्कूल से निकल कर बाग़ों की सैर करना जब तू नहीं तो अब हम जाएँ कहाँ अकेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले वो खेल खेल ही में कुछ देर रूठ जाना फिर एक दूसरे को आपस में ही मनाना अब कौन आ के मुझ से आख़िर वो खेल खेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले फिर फ़ेल हो गए हम अब घर को कैसे जाएँ क्या शक्ल ले के अपने माँ बाप को दिखाएँ चारों तरफ़ लगे हैं नाकामियों के मेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले — Kaif Ahmad Siddiqui
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' अपने फ़न में बड़े हुश्यार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' आप का नाम असदुल्लाह था नौ-शाह लक़ब मिर्ज़ा ग़ालिब से हुए बा'द में मारूफ़-ए-अदब आज भी पढ़ के कलाम आप का हैरत में हैं सब ज़ुल्फ़-ए-उर्दू में गिरफ़्तार थे मिर्ज़ा ग़ालिब मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा ग़ालिब अकबराबाद में पैदा हुए देहली में रहे अहद-ए-तिफ़्ली ही से दुनिया के बड़े ज़ुल्म सहे अब भी हर अहल-ए-सुख़न आप को उस्ताद कहे सारे शोअ'रा के अलम-दार थे मिर्ज़ा ग़ालिब मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' तंग-दस्ती में भी छोड़ा न वफ़ा का दामन मुफ़्लिसी में भी न अपनाए ख़ुशामद के चलन ख़ून-ए-जज़बात से शादाब किया बाग़-ए-सुख़न फ़ितरतन शायर-ए-ख़ुद्दार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा ग़ालिब आप पर फ़ारसी शोअ'रा का भी था ख़ूब असर मसअला ख़िदमत-ए-उर्दू का भी था पेश-ए-नज़र अपने अश'आर की अज़्मत से भी वाक़िफ़ थे मगर 'मीर' जी के भी तरफ़-दार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' ख़त-नवीसी का दिया एक अनोखा अंदाज़ गूँज उठी बज़्म-ए-अदब में ये निराली आवाज़ आप मैदान-ए-सुख़न में भी थे सब से मुम्ताज़ साथ ही इक बड़े नस्सार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' बे-नियाज़-ए-ग़म-ओ-आलाम हर इक फ़िक्र से दूर हो मुसीबत में भी रहते थे हमेशा मसरूर आज भी जिन के लतीफ़े हैं जहाँ में मशहूर मुस्कुराते हुए किरदार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' — Kaif Ahmad Siddiqui
जब क्लास से टीचर जाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है हम मिल कर शोर मचाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है छुट्टी की इजाज़त मिलते ही हम जेल के इक क़ैदी की तरह स्कूल से बाहर आते हैं तो कितनी मसर्रत होती है जिस वक़्त पढ़ाते हैं टीचर दिल कितना परेशाँ होता है लेकिन जब खेल खिलाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है जब हम को किसी पिकनिक के लिए स्कूल की जानिब से अक्सर उस्ताद कहीं ले जाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है दर्जे में पढ़ाते वक़्त अक्सर जब मेरे सवालों पर यारो उस्ताद भी चक्कर खाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है बाज़ार से जा कर मेरे लिए हर माह मिरे प्यारे पापा बच्चों का रिसाला लाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है इन दर्सी किताबों में हम को कुछ लुत्फ़ नहीं मिलता लेकिन जब 'कैफ़' की नज़्में गाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है — Kaif Ahmad Siddiqui
अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं इक दिन वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ होंगे हमीं गौतम हमीं 'गाँधी' हमीं 'ज़ाकिर' हमीं 'नेहरू' हमीं 'चिश्ती' हमीं नानक हमीं हैदर हमीं टीपू हमीं अपने वतन की सरहदों के पासबाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं में कोई टीचर और कोई डॉक्टर होगा कोई ता'लीम का अफ़सर कोई इंजीनियर होगा हमीं हर चीज़ के महरम हमीं साइंसदाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं रौशन करेंगे चाँद का हर राज़-ए-पोशीदा हमीं ज़ाहिर करेंगे हक़ की हर आवाज़-ए-पोशीदा हमीं क़ुदरत के हर राज़-ए-निहाँ के राज़-दाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं हैं 'सूर'-ओ-'तुलसी' 'ग़ालिब'-ओ-'टैगोर' भी होंगे हमीं क्या 'कैफ़' हम लोगों से बेहतर और भी होंगे कि जो दुनिया के गुलशन में बहार-ए-जावेदाँ होंगे अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे हमीं इक दिन वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ होंगे — Kaif Ahmad Siddiqui
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले इक साथ रह के कैसा बचपन गुज़र रहा था कितनी ख़ुशी से अपना जीवन गुज़र रहा था किस काम का ये पढ़ना जो दोस्ती से खेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले वो तेरे साथ जा कर गलियों की सैर करना स्कूल से निकल कर बाग़ों की सैर करना जब तू नहीं तो अब हम जाएँ कहाँ अकेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले वो खेल खेल ही में कुछ देर रूठ जाना फिर एक दूसरे को आपस ही में मनाना अब कौन आ के मुझ से आख़िर वो खेल खेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले फिर फ़ेल हो गए हम अब घर को कैसे जाएँ क्या शक्ल ले के अपने माँ बाप को दिखाएँ चारों तरफ़ लगे हैं नाकामियों के मेले ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले हम रह गए अकेले — Kaif Ahmad Siddiqui
सब ज़बानों की जान है उर्दू कितनी प्यारी ज़बान है उर्दू सारे अल्फ़ाज़ क़ीमती गौहर जौहरी की दुकान है उर्दू ये तराशे हुए हसीं जुमले जैसे हीरों की कान है उर्दू एक इक लफ़्ज़ मिस्ल-ए-शीर-ओ-शकर कितनी मीठी ज़बान है उर्दू सारी दुनिया में जिस की शोहरत है फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्तान है उर्दू ख़्वाह हिन्दू हो सिख हो या मुस्लिम हर बशर की ज़बान है उर्दू शहर-ए-दिल्ली का सिर्फ़ दिल ही नहीं सारे भारत की जान है उर्दू हैदराबाद-ओ-लखनऊ ही नहीं हर जगह की ज़बान है उर्दू कितनी सदियाँ गुज़र चुकीं लेकिन आज तक नौजवान है उर्दू 'कैफ़' उर्दू के जो मुख़ालिफ़ हैं उन के घर की ज़बान है उर्दू — Kaif Ahmad Siddiqui