जब क्लास से टीचर जाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है

हम मिल कर शोर मचाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
छुट्टी की इजाज़त मिलते ही हम जेल के इक क़ैदी की तरह
स्कूल से बाहर आते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
जिस वक़्त पढ़ाते हैं टीचर दिल कितना परेशाँ होता है
लेकिन जब खेल खिलाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
जब हम को किसी पिकनिक के लिए स्कूल की जानिब से अक्सर
उस्ताद कहीं ले जाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
दर्जे में पढ़ाते वक़्त अक्सर जब मेरे सवालों पर यारो
उस्ताद भी चक्कर खाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
बाज़ार से जा कर मेरे लिए हर माह मिरे प्यारे पापा
बच्चों का रिसाला लाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
इन दर्सी किताबों में हम को कुछ लुत्फ़ नहीं मिलता लेकिन
जब 'कैफ़' की नज़्में गाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है

— Kaif Ahmad Siddiqui

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