हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
ता'लीम न होगी जिस में कभी सब आज़ादी से घू
ता'लीम न होगी जिस में कभी सब आज़ादी से घू
मेंगे
उस्ताद पढ़ेंगे दर्जों में हम लोग ख़ुशी से घू
मेंगे
स्कूल न जा कर बाग़ों में तफ़रीह करेंगे बे-मतलब
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
पढ़ने के लिए बच्चों को जहाँ मुर्ग़ा न बनाया जाएगा
चाँटे न जमाए जाएँगे डंडों से न पीटा जाएगा
उस्ताद के मौला-बख़्श जहाँ दिखला न सकेंगे कुछ कर्तब
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
जो याद करेगा ख़ूब सबक़ ता-उम्र न होगा पास वही
जो खेल में लेगा दिलचस्पी पढ़ने में न होगा फ़ेल कभी
दर-अस्ल हमारे मकतब का होगा हर इक दस्तूर अजब
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
जिस दिन भी पड़ा बीमार कोई स्कूल में होगा हॉलीडे
दो बूँद भी पानी बरसा तो हो जाएगा फ़ौरन रेनी डे
हफ़्ते में तो कम से कम छे दिन इतवार मनाएँगे हम सब
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
खेलेंगे कभी जब हम क्रिकेट तो ख़ूब उड़ाएँगे छक्के
हॉकी में दिखाएँगे वो हुनर रह जाएँगे सब हक्के-बक्के
हर टीम से मैचें जीतेगा हम लोगों का फूटबाल क्लब
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
Read Fullउस्ताद पढ़ेंगे दर्जों में हम लोग ख़ुशी से घू
मेंगे
स्कूल न जा कर बाग़ों में तफ़रीह करेंगे बे-मतलब
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
पढ़ने के लिए बच्चों को जहाँ मुर्ग़ा न बनाया जाएगा
चाँटे न जमाए जाएँगे डंडों से न पीटा जाएगा
उस्ताद के मौला-बख़्श जहाँ दिखला न सकेंगे कुछ कर्तब
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
जो याद करेगा ख़ूब सबक़ ता-उम्र न होगा पास वही
जो खेल में लेगा दिलचस्पी पढ़ने में न होगा फ़ेल कभी
दर-अस्ल हमारे मकतब का होगा हर इक दस्तूर अजब
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
जिस दिन भी पड़ा बीमार कोई स्कूल में होगा हॉलीडे
दो बूँद भी पानी बरसा तो हो जाएगा फ़ौरन रेनी डे
हफ़्ते में तो कम से कम छे दिन इतवार मनाएँगे हम सब
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
खेलेंगे कभी जब हम क्रिकेट तो ख़ूब उड़ाएँगे छक्के
हॉकी में दिखाएँगे वो हुनर रह जाएँगे सब हक्के-बक्के
हर टीम से मैचें जीतेगा हम लोगों का फूटबाल क्लब
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
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छुट्टी की इजाज़त मिलते ही हम जेल के इक क़ैदी की तरह
स्कूल से बाहर आते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
जिस वक़्त पढ़ाते हैं टीचर दिल कितना परेशाँ होता है
लेकिन जब खेल खिलाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
जब हम को किसी पिकनिक के लिए स्कूल की जानिब से अक्सर
उस्ताद कहीं ले जाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
दर्जे में पढ़ाते वक़्त अक्सर जब मेरे सवालों पर यारो
उस्ताद भी चक्कर खाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
बाज़ार से जा कर मेरे लिए हर माह मिरे प्यारे पापा
बच्चों का रिसाला लाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
इन दर्सी किताबों में हम को कुछ लुत्फ़ नहीं मिलता लेकिन
जब 'कैफ़' की नज़्में गाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
Read Fullस्कूल से बाहर आते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
जिस वक़्त पढ़ाते हैं टीचर दिल कितना परेशाँ होता है
लेकिन जब खेल खिलाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
जब हम को किसी पिकनिक के लिए स्कूल की जानिब से अक्सर
उस्ताद कहीं ले जाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
दर्जे में पढ़ाते वक़्त अक्सर जब मेरे सवालों पर यारो
उस्ताद भी चक्कर खाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
बाज़ार से जा कर मेरे लिए हर माह मिरे प्यारे पापा
बच्चों का रिसाला लाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
इन दर्सी किताबों में हम को कुछ लुत्फ़ नहीं मिलता लेकिन
जब 'कैफ़' की नज़्में गाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
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सोचता हूँ
वक़्त की गर्दन पकड़ कर
वक़्त की गर्दन पकड़ कर
रेशमी स्कार्फ़ का फंदा लगा कर
खींच लूँ
और इतनी ज़ोर से चीख़ूँ
ज़मीं से
आसमाँ तक
सिर्फ़ मेरी चीख़ ही का शोर गूँजे
वक़्त की मरती हुई आवाज़ कोई सुन न पाए
सोचता हूँ
वुसअत-ए-आफ़ाक़ में परवाज़ कर के
रात की आँखों में तारीकी का पर्दा डाल कर मैं
चाँद तारों को चुरा लाऊँ ज़मीं पर
और थोड़ी देर
बच्चों की तरह ख़ुश हो के खेलूँ
खेलने से भी जब अपना दिल न बहले
एक पत्थर पर पटख़ कर
हर खिलौने को मैं चकना-चूर कर दूँ
सोचता हूँ
आसमाँ से छीन कर
जलते हुए सूरज की थाली
एक कश्ती की तरह
गहरे समुंदर में चलाऊँ
और उस पर सारी दुनिया को बिठा कर
ग़र्क़ कर दूँ
सोचता हूँ
सोचते ही सोचते
मैं ख़ुद ही इक दिन
सोच के आतिश-कदा में जल न जाऊँ
Read Fullखींच लूँ
और इतनी ज़ोर से चीख़ूँ
ज़मीं से
आसमाँ तक
सिर्फ़ मेरी चीख़ ही का शोर गूँजे
वक़्त की मरती हुई आवाज़ कोई सुन न पाए
सोचता हूँ
वुसअत-ए-आफ़ाक़ में परवाज़ कर के
रात की आँखों में तारीकी का पर्दा डाल कर मैं
चाँद तारों को चुरा लाऊँ ज़मीं पर
और थोड़ी देर
बच्चों की तरह ख़ुश हो के खेलूँ
खेलने से भी जब अपना दिल न बहले
एक पत्थर पर पटख़ कर
हर खिलौने को मैं चकना-चूर कर दूँ
सोचता हूँ
आसमाँ से छीन कर
जलते हुए सूरज की थाली
एक कश्ती की तरह
गहरे समुंदर में चलाऊँ
और उस पर सारी दुनिया को बिठा कर
ग़र्क़ कर दूँ
सोचता हूँ
सोचते ही सोचते
मैं ख़ुद ही इक दिन
सोच के आतिश-कदा में जल न जाऊँ
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आप का नाम असदुल्लाह था नौ-शाह लक़ब
मिर्ज़ा ग़ालिब से हुए बा'द में मारूफ़-ए-अदब
आज भी पढ़ के कलाम आप का हैरत में हैं सब
ज़ुल्फ़-ए-उर्दू में गिरफ़्तार थे मिर्ज़ा ग़ालिब
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा ग़ालिब
अकबराबाद में पैदा हुए देहली में रहे
अहद-ए-तिफ़्ली ही से दुनिया के बड़े ज़ुल्म सहे
अब भी हर अहल-ए-सुख़न आप को उस्ताद कहे
सारे शोअ'रा के अलम-दार थे मिर्ज़ा ग़ालिब
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
तंग-दस्ती में भी छोड़ा न वफ़ा का दामन
मुफ़्लिसी में भी न अपनाए ख़ुशामद के चलन
ख़ून-ए-जज़बात से शादाब किया बाग़-ए-सुख़न
फ़ितरतन शायर-ए-ख़ुद्दार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा ग़ालिब
आप पर फ़ारसी शोअ'रा का भी था ख़ूब असर
मसअला ख़िदमत-ए-उर्दू का भी था पेश-ए-नज़र
अपने अश'आर की अज़्मत से भी वाक़िफ़ थे मगर
'मीर' जी के भी तरफ़-दार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
ख़त-नवीसी का दिया एक अनोखा अंदाज़
गूँज उठी बज़्म-ए-अदब में ये निराली आवाज़
आप मैदान-ए-सुख़न में भी थे सब से मुम्ताज़
साथ ही इक बड़े नस्सार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
बे-नियाज़-ए-ग़म-ओ-आलाम हर इक फ़िक्र से दूर
हो मुसीबत में भी रहते थे हमेशा मसरूर
आज भी जिन के लतीफ़े हैं जहाँ में मशहूर
मुस्कुराते हुए किरदार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
Read Fullमिर्ज़ा ग़ालिब से हुए बा'द में मारूफ़-ए-अदब
आज भी पढ़ के कलाम आप का हैरत में हैं सब
ज़ुल्फ़-ए-उर्दू में गिरफ़्तार थे मिर्ज़ा ग़ालिब
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा ग़ालिब
अकबराबाद में पैदा हुए देहली में रहे
अहद-ए-तिफ़्ली ही से दुनिया के बड़े ज़ुल्म सहे
अब भी हर अहल-ए-सुख़न आप को उस्ताद कहे
सारे शोअ'रा के अलम-दार थे मिर्ज़ा ग़ालिब
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
तंग-दस्ती में भी छोड़ा न वफ़ा का दामन
मुफ़्लिसी में भी न अपनाए ख़ुशामद के चलन
ख़ून-ए-जज़बात से शादाब किया बाग़-ए-सुख़न
फ़ितरतन शायर-ए-ख़ुद्दार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा ग़ालिब
आप पर फ़ारसी शोअ'रा का भी था ख़ूब असर
मसअला ख़िदमत-ए-उर्दू का भी था पेश-ए-नज़र
अपने अश'आर की अज़्मत से भी वाक़िफ़ थे मगर
'मीर' जी के भी तरफ़-दार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
ख़त-नवीसी का दिया एक अनोखा अंदाज़
गूँज उठी बज़्म-ए-अदब में ये निराली आवाज़
आप मैदान-ए-सुख़न में भी थे सब से मुम्ताज़
साथ ही इक बड़े नस्सार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
बे-नियाज़-ए-ग़म-ओ-आलाम हर इक फ़िक्र से दूर
हो मुसीबत में भी रहते थे हमेशा मसरूर
आज भी जिन के लतीफ़े हैं जहाँ में मशहूर
मुस्कुराते हुए किरदार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
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ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले
हम रह गए अकेले
हम रह गए अकेले
इक साथ रह के कैसा बचपन गुज़र रहा था
कितनी ख़ुशी से अपना जीवन गुज़र रहा था
किस काम का ये पढ़ना जो दोस्ती से खेले
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले
हम रह गए अकेले
वो तेरे साथ जा कर गलियों की सैर करना
स्कूल से निकल कर बाग़ों की सैर करना
जब तू नहीं तो अब हम जाएँ कहाँ अकेले
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले
हम रह गए अकेले
वो खेल खेल ही में कुछ देर रूठ जाना
फिर एक दूसरे को आपस में ही मनाना
अब कौन आ के मुझ से आख़िर वो खेल खेले
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले
हम रह गए अकेले
फिर फ़ेल हो गए हम अब घर को कैसे जाएँ
क्या शक्ल ले के अपने माँ बाप को दिखाएँ
चारों तरफ़ लगे हैं नाकामियों के मेले
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले
हम रह गए अकेले
Read Fullकितनी ख़ुशी से अपना जीवन गुज़र रहा था
किस काम का ये पढ़ना जो दोस्ती से खेले
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले
हम रह गए अकेले
वो तेरे साथ जा कर गलियों की सैर करना
स्कूल से निकल कर बाग़ों की सैर करना
जब तू नहीं तो अब हम जाएँ कहाँ अकेले
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले
हम रह गए अकेले
वो खेल खेल ही में कुछ देर रूठ जाना
फिर एक दूसरे को आपस में ही मनाना
अब कौन आ के मुझ से आख़िर वो खेल खेले
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले
हम रह गए अकेले
फिर फ़ेल हो गए हम अब घर को कैसे जाएँ
क्या शक्ल ले के अपने माँ बाप को दिखाएँ
चारों तरफ़ लगे हैं नाकामियों के मेले
ओ पास होने वाले हम को भी साथ ले ले
हम रह गए अकेले
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किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद अभी इक रेत का मैदान है लेकिन
ये माना चाँद अभी इक रेत का मैदान है लेकिन
किसी दिन जा के हम इस को हसीं जन्नत बनाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद पर इस वक़्त आबादी नहीं लेकिन
किसी दिन हम वहाँ जा कर नई बस्ती बसाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद अभी बद-सूरत-ओ-बद-शक्ल है लेकिन
किसी दिन हम उसे दुनिया से भी दिलकश बनाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद पर हर सम्त हैं ज्वाला-मुखी लेकिन
किसी दिन हम वहाँ पर प्यार की कलियाँ खिलाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद अंदर से बहुत तारीक है लेकिन
किसी दिन हम वहाँ पर अम्न की शमएँ जलाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद पर हर सम्त हैं वीरानियाँ लेकिन
किसी दिन हम वहाँ जा कर बहुत धू
में मचाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद पर जाना अभी बे-कार है लेकिन
वो दिन भी आएगा जब हम वहाँ पिकनिक मनाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
Read Fullकिसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद पर इस वक़्त आबादी नहीं लेकिन
किसी दिन हम वहाँ जा कर नई बस्ती बसाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद अभी बद-सूरत-ओ-बद-शक्ल है लेकिन
किसी दिन हम उसे दुनिया से भी दिलकश बनाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद पर हर सम्त हैं ज्वाला-मुखी लेकिन
किसी दिन हम वहाँ पर प्यार की कलियाँ खिलाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद अंदर से बहुत तारीक है लेकिन
किसी दिन हम वहाँ पर अम्न की शमएँ जलाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद पर हर सम्त हैं वीरानियाँ लेकिन
किसी दिन हम वहाँ जा कर बहुत धू
में मचाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
ये माना चाँद पर जाना अभी बे-कार है लेकिन
वो दिन भी आएगा जब हम वहाँ पिकनिक मनाएँगे
किसी दिन चाँद पर हम लोग भी रॉकेट से जाएँगे
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नतीजा सुन के कई लोग बद-हवा से हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
सिला मिला है हमें साल भर की मेहनत का
चमक रहा है सितारा हमारी क़िस्मत का
यही तो वक़्त मिला है हमें मसर्रत का
जो फ़ेल हो गए वो किस क़दर उदास हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
वो इम्तिहान में रातों को जाग कर पढ़ना
वो नींद आँखों में छाई हुई मगर पढ़ना
वो आधी रात से बिस्तर पे ता-सहर पढ़ना
ज़हे-नसीब वो लम्हात हम को रास हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
जो खेल-कूद में दिन-रात चूर रहते थे
हर एक खेल में शामिल ज़रूर रहते थे
जो सुब्ह-ओ-शाम किताबों से दूर रहते थे
जहाँ में आज वही मुब्तला-ए-यास हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
जिन्हें था अपनी लियाक़त पे ए'तिबार बहुत
जिन्हें ख़ुद अपने क़लम पर था इख़्तियार बहुत
जो अपने आप को समझे थे होशियार बहुत
उन्हीं के होश उड़े और गुम हवा से हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
Read Fullचमक रहा है सितारा हमारी क़िस्मत का
यही तो वक़्त मिला है हमें मसर्रत का
जो फ़ेल हो गए वो किस क़दर उदास हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
वो इम्तिहान में रातों को जाग कर पढ़ना
वो नींद आँखों में छाई हुई मगर पढ़ना
वो आधी रात से बिस्तर पे ता-सहर पढ़ना
ज़हे-नसीब वो लम्हात हम को रास हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
जो खेल-कूद में दिन-रात चूर रहते थे
हर एक खेल में शामिल ज़रूर रहते थे
जो सुब्ह-ओ-शाम किताबों से दूर रहते थे
जहाँ में आज वही मुब्तला-ए-यास हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
जिन्हें था अपनी लियाक़त पे ए'तिबार बहुत
जिन्हें ख़ुद अपने क़लम पर था इख़्तियार बहुत
जो अपने आप को समझे थे होशियार बहुत
उन्हीं के होश उड़े और गुम हवा से हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
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सब ज़बानों की जान है उर्दू
कितनी प्यारी ज़बान है उर्दू
कितनी प्यारी ज़बान है उर्दू
सारे अल्फ़ाज़ क़ीमती गौहर
जौहरी की दुकान है उर्दू
ये तराशे हुए हसीं जुमले
जैसे हीरों की कान है उर्दू
एक इक लफ़्ज़ मिस्ल-ए-शीर-ओ-शकर
कितनी मीठी ज़बान है उर्दू
सारी दुनिया में जिस की शोहरत है
फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्तान है उर्दू
ख़्वाह हिन्दू हो सिख हो या मुस्लिम
हर बशर की ज़बान है उर्दू
शहर-ए-दिल्ली का सिर्फ़ दिल ही नहीं
सारे भारत की जान है उर्दू
हैदराबाद-ओ-लखनऊ ही नहीं
हर जगह की ज़बान है उर्दू
कितनी सदियाँ गुज़र चुकीं लेकिन
आज तक नौजवान है उर्दू
'कैफ़' उर्दू के जो मुख़ालिफ़ हैं
उन के घर की ज़बान है उर्दू
Read Fullजौहरी की दुकान है उर्दू
ये तराशे हुए हसीं जुमले
जैसे हीरों की कान है उर्दू
एक इक लफ़्ज़ मिस्ल-ए-शीर-ओ-शकर
कितनी मीठी ज़बान है उर्दू
सारी दुनिया में जिस की शोहरत है
फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्तान है उर्दू
ख़्वाह हिन्दू हो सिख हो या मुस्लिम
हर बशर की ज़बान है उर्दू
शहर-ए-दिल्ली का सिर्फ़ दिल ही नहीं
सारे भारत की जान है उर्दू
हैदराबाद-ओ-लखनऊ ही नहीं
हर जगह की ज़बान है उर्दू
कितनी सदियाँ गुज़र चुकीं लेकिन
आज तक नौजवान है उर्दू
'कैफ़' उर्दू के जो मुख़ालिफ़ हैं
उन के घर की ज़बान है उर्दू
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तोड़ देते हैं जहालत के अँधेरों का तिलिस्म
इल्म की शम्अ'' जलाते हैं हमारे उस्ताद
मंज़िल-ए-इ'ल्म के हम लोग मुसाफ़िर हैं मगर
रास्ता हम को दिखाते हैं हमारे उस्ताद
ज़िंदगी नाम है काँटों के सफ़र का लेकिन
राह में फूल बिछाते हैं हमारे उस्ताद
दिल में हर लम्हा तरक़्क़ी की दुआ करते हैं
हम को आगे ही बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद
सब को तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का सबक़ देते हैं
हम को इंसान बनाते हैं हमारे उस्ताद
हम को देते हैं ब-हर-लम्हा पयाम-ए-ता'लीम
अच्छी बातें ही बताते हैं हमारे उस्ताद
ख़ुद तो रहते हैं बहुत तंग-ओ-परेशान मगर
दौलत-ए-इल्म लुटाते हैं हमारे उस्ताद
हम पे लाज़िम है कि हम लोग करें उन का अदब
किस मोहब्बत से बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद
Read Fullइल्म की शम्अ'' जलाते हैं हमारे उस्ताद
मंज़िल-ए-इ'ल्म के हम लोग मुसाफ़िर हैं मगर
रास्ता हम को दिखाते हैं हमारे उस्ताद
ज़िंदगी नाम है काँटों के सफ़र का लेकिन
राह में फूल बिछाते हैं हमारे उस्ताद
दिल में हर लम्हा तरक़्क़ी की दुआ करते हैं
हम को आगे ही बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद
सब को तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का सबक़ देते हैं
हम को इंसान बनाते हैं हमारे उस्ताद
हम को देते हैं ब-हर-लम्हा पयाम-ए-ता'लीम
अच्छी बातें ही बताते हैं हमारे उस्ताद
ख़ुद तो रहते हैं बहुत तंग-ओ-परेशान मगर
दौलत-ए-इल्म लुटाते हैं हमारे उस्ताद
हम पे लाज़िम है कि हम लोग करें उन का अदब
किस मोहब्बत से बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद
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हम आज कुछ हसीन सराबों में खो गए
आँखें खुलीं तो जागते ख़्वाबों में खो गए
आँखें खुलीं तो जागते ख़्वाबों में खो गए
हम सफ़्हा-ए-हयात से जब बे-निशाँ हुए
लफ़्ज़ों की रूह बन के किताबों में खो गए
आईना-ए-बहार के कुछ अक्स-ए-मुज़्महिल
ख़ुशबू का रंग पा के गुलाबों में खो गए
दर-अस्ल बर्शगाल के तुम आफ़्ताब थे
बरसात जब हुई तो सहाबों में खो गए
निकले थे जो भी आज तलाश-ए-सवाब में
वो ज़िंदगी के सख़्त अज़ाबों में खो गए
दिल को थी एक शहर-ए-तमन्ना की जुस्तुजू
लेकिन हम आरज़ू के ख़राबों में खो गए
जब मसअला हयात का कुछ हल न हो सका
हम 'कैफ़' फ़लसफ़े की किताबों में खो गए
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