Nafas Ambalvi

Nafas Ambalvi

@nafas-ambalvi

Nafas Ambalvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Nafas Ambalvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

उसे गुमाँ है कि मेरी उड़ान कुछ कम है मुझे यक़ीं है कि ये आसमान कुछ कम है — Nafas Ambalvi

Ghazal

सहरा में जो मिला था मुझे इतना याद है मेरा ही नक़्श-ए-पा था मुझे इतना याद है इतना लहू लहू तो नहीं था बदन मिरा हाँ ज़ख़्म इक हरा था मुझे इतना याद है फिर क्या हुआ कभी मिरी बर्बादियों से पूछ तेरी तरफ़ चला था मुझे इतना याद है वो भीड़ में खड़ा है जो पत्थर लिए हुए कल तक मिरा ख़ुदा था मुझे इतना याद है इक शहर जिस ने कल मिरी आवाज़ छीन ली वो शहर-ए-बे-नवा था मुझे इतना याद है मैं जैसे मुद्दतों से इसी रहगुज़र में हूँ पल भर का फ़ासला था मुझे इतना याद है जाने फिर उस के बा'द मुझे उस ने क्या कहा हाफ़िज़ ख़ुदा कहा था मुझे इतना याद है चेहरा किसी का अब भी तसव्वुर में है 'नफ़स' इक अजनबी मिला था मुझे इतना याद है — Nafas Ambalvi
उम्र-भर दर्द के रिश्तों को निभाने से रहा ज़िंदगी में तो तिरे नाज़ उठाने से रहा जब भी देखा तो किनारों पे तड़पता देखा ये समुंदर तो मिरी प्यास बुझाने से रहा बस यही सोच के सर अपना क़लम कर डाला अब वो इल्ज़ाम मिरे सर तो लगाने से रहा इस ज़माने में जहालत से गुज़र होती है अब हुनर से तो कोई घर को चलाने से रहा हम ही तरकीब करें कोई उजालों के लिए अब अँधेरा तो चराग़ों को जलाने से रहा वक़्त के मरमरीं पत्थर पे ग़ज़ल लिखता हूँ ये इबारत कोई मौसम तो मिटाने से रहा बे-तअल्लुक़ तो नहीं उम्र गुज़ारी है 'नफ़स' रिश्ता-ए-ग़ैर सही कुछ तो ज़माने से रहा — Nafas Ambalvi
मिलते हैं मुस्कुरा के अगरचे तमाम लोग मर मर के जी रहे हैं मगर सुब्ह-ओ-शाम लोग ये भूक ये हवस ये तनज़्ज़ुल ये वहशतें ता'मीर कर रहे हैं ये कैसा निज़ाम लोग बर्बादियों ने मुझ को बहुत सुर्ख़-रू किया करने लगे हैं अब तो मिरा एहतिराम लोग इनकार कर रहा हूँ तो क़ीमत बुलंद है बिकने पे आ गया तो गिरा देंगे दाम लोग इस अहद में अना की हिफ़ाज़त के वास्ते फिरते हैं ले के हाथ में ख़ाली नियाम लोग बैठे हैं ख़ुद ही पाँव में ज़ंजीर डाल कर हैराँ हूँ बुज़दिली के हैं कितने ग़ुलाम लोग किस किस का ए'तिबार करें शहर में 'नफ़स' चेहरे बदल बदल के मिले हैं तमाम लोग — Nafas Ambalvi
मज़हबी चिंगारियों से बस्तियाँ जल जाएँगी इन चराग़ों से न उलझो उँगलियाँ जल जाएँगी आग गुलशन में लगा दी और सोचा भी नहीं इन गुलों के साथ कितनी तितलियाँ जल जाएँगी नफ़रतों की आँधियाँ यूँँ ही अगर चलती रही राख में पिन्हाँ हैं जो चिंगारियाँ जल जाएँगी आसमानों को जला कर एक दिन पछताओगे जल उठा सावन तो सारी बदलियाँ जल जाएँगी कोई शोर-ओ-ग़ुल न सन्नाटों का फिर होगा वजूद साथ ही आवाज़ के ख़ामोशियाँ जल जाएँगी यूँँ ही गर तन्हाइयों के दाएरे बढ़ते गए आदमी रह जाएगा परछाइयाँ जल जाएँगी फिर मोहब्बत के अलावों को नफ़स रौशन करो धीमी धीमी आँच में सब तल्ख़ियाँ जल जाएँगी — Nafas Ambalvi
सर-बरहना भरी बरसात में घर से निकले हम भी किस गर्दिश-ए-हालात में घर से निकले दिन में किस किस को बताएँगे मसाफ़त का सबब बस यही सोच के हम रात में घर से निकले सर पे ख़ुद अपनी सलीबों को उठाए हम लोग रूह का बोझ लिए ज़ात में घर से निकले कब बरस जाएँ इन आँखों का भरोसा ही नहीं कौन बे-वक़्त की बरसात में घर से निकले डर गया देख के मैं शहर-ए-मुहज़्ज़ब का चलन कितने आसेब फ़सादात में घर से निकले ऐन मुमकिन है की वो दिन में नुमायाँ ही न हो उस सितारे से कहो रात में घर से निकले उन की फ़ितरत में तग़ाफ़ुल भी मुरक्कब था 'नफ़स' हम ही नादाँ थे जो जज़्बात में घर से निकले — Nafas Ambalvi
धूप थी सहरा था लेकिन जिस्म का साया न था आदमी इस से ज़ियादा तो कभी तन्हा न था खींचते थे अपनी जानिब रेगज़ारों के सराब दूर तक सहरा में लेकिन आब का क़तरा न था एक मुबहम ख़्वाब था आँखों में और दिल में जुनूँ ज़ेहन में लेकिन इमारत का कोई नक़्शा न था भीड़ थी बस्ती में लेकिन मैं किसे पहचानता इतने लोगों में किसी भी शख़्स का चेहरा न था इस क़दर शिद्दत से वो दरिया समुंदर से मिला अब समुंदर ही समुंदर था कहीं दरिया न था घर की अज़्मत हाए जिस दीवार से महफ़ूज़ थी घर के दरवाज़े पे अब वो टाट का पर्दा न था वो ग़ज़ल अपनी सजाता था लहू के रंग से फिर भी कहते हैं 'नफ़स' उस का कोई पेशा न था — Nafas Ambalvi
न जाने कब की दबी तल्ख़ियाँ निकल आईं ज़रा सी बात थी और बर्छियाँ निकल आईं हुआ ये हम पे अँधेरों की साज़िशों का असर हमारे ज़ेहन में भी खिड़कियाँ निकल आईं मुझे नवाज़ दी मौला ने फूल सी बेटी मिरे हिसाब में कुछ नेकियाँ निकल आईं वो पेड़ जिस पे क़ज़ा बन के बिजलियाँ टूटीं सुना है उस पे हरी पत्तियाँ निकल आईं बदलती रुत में ये कम-ज़र्फ़ियों का आलम है बिलों से पँख लिए च्यूँँंटियाँ निकल आईं ख़ुदा के वास्ते अब तो सफ़र तमाम करो कि अब क़फ़स से भी तो उँगलियाँ निकल आईं ये मो'जिज़ा ही तो है ऐ 'नफ़स' कि तूफ़ाँ में समुंदरों से सभी कश्तियाँ निकल आईं — Nafas Ambalvi
कौन सी शाख़ का पत्ता था हरा भूल गया पेड़ से टूट के मैं अपना पता भूल गया मैं कोई वादा-फ़रामोश नहीं हूँ फिर भी मुझ पे इल्ज़ाम है मैं अपना कहा भूल गया अपने बच्चों के खिलौने तो उसे याद रहे घर में बीमार पड़ी माँ की दवा भूल गया कर तो दीं मैं ने चराग़ों की क़तारें रौशन है ज़माने की मगर तेज़ हवा भूल गया ख़ौफ़-ए-दोज़ख़ से डराता रहा वाइ'ज़ मुझ को और ख़ुद अपने गुनाहों कि सज़ा भूल गया तुझ से कुछ काम था लेकिन तिरे घर के आगे अब खड़ा सोच रहा हूँ की मैं क्या भूल गया बे-ख़ुदी हद से जो गुज़री तो मैं इक रोज़ 'नफ़स' घर से क्या निकला कि फिर घर पता का भूल गया — Nafas Ambalvi
हम आज अपना मुक़द्दर बदल के देखते हैं तुम्हारे साथ भी कुछ दूर चल के देखते हैं उधर चराग़ बुझाने को है हवा बेताब इधर ये ज़िद कि हवाओं में जल के देखते हैं चलो फिर आज ज़मीनों में जज़्ब हो जाएँ छलक के आँख से बाहर निकल के देखते हैं ये इश्क़ कोई बला है जुनून है क्या है ये कैसी आग है पत्थर पिघल के देखते हैं अजीब प्यास है दरिया से बुझ नहीं पाई जो तुम कहो तो समुंदर निगल के देखते हैं वो गर निगाह मिला ले तो मो'जिज़ा कर दे इसी लिए तो उधर हम सँभल के देखते हैं बदल के ख़ुद ही हमीं रह गए ज़माने में चले थे घर से कि दुनिया बदल के देखते हैं — Nafas Ambalvi