अगर चराग़ भी आँधी से डर गए होते

तो सोचिए कि उजाले किधर गए होते

ये मेरे दोस्त मिरे चारा-गर मिरे अहबाब
न छेड़ते तो मिरे ज़ख़्म भर गए होते

कोई निगाह जो अपनी भी मुंतज़िर होती
तो हम भी शाम ढले अपने घर गए होते

अगर वो मेरी अयादत को आ गया होता
तो दोस्तों के भी चेहरे उतर गए होते

हमें तो शौक़-ए-सुख़न ने समेट रक्खा है
वगर्ना हम तो कभी के बिखर गए होते

उन्हें भी मुझ से मोहब्बत तो है 'नफ़स' लेकिन
मैं पूछता तो यक़ीनन मुकर गए होते

— Nafas Ambalvi

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