इतनी मुश्किल में कभी पहले तो जाँ आई न थी

ऐ मोहब्बत जब मिरी तुझ से शनासाई न थी

ज़िंदगी में सैंकड़ों ग़म थे तिरे ग़म के सिवा
दिल में वीराने तो थे पर इतनी तन्हाई न थी

रहगुज़र थी हादसे थे फ़ासला था धूप थी
बरहना-पाई थी लेकिन आबला-पाई न थी

बच के तूफ़ाँ से किसी सूरत निकल आए मगर
हम वहाँ डूबे जहाँ दरिया में गहराई न थी

ऐ मसीहा देखने निकला था मैं तेरा निज़ाम
हर तरफ़ तू था मगर तेरी मसीहाई न थी

अपने ज़ख़्मों की नुमाइश बे-हिसों के शहर में
इस दिल-ए-मुज़्तर की नादानी थी दानाई न थी

— Nafas Ambalvi

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