Sabiha Saba

Top 10 of Sabiha Saba

    दुरुस्त है कि ये दिन राएगाँ नहीं गुज़रे
    मगर सुकूँ से तो ऐ जान-ए-जाँ नहीं गुज़रे

    मिज़ाज-ए-शहर-ए-जुनूँ अब ये बरहमी कैसी
    किस आग से तिरे पीर-ओ-जवाँ नहीं गुज़रे

    नज़र से दूर सही फिर भी कुश्तगान-ए-वफ़ा
    वहाँ से कम तो ये सद
    में यहाँ नहीं गुज़रे

    मुरव्वतन वो मिरी बात पूछ कर चुप हैं
    वगरना कब मिरे शिकवे गराँ नहीं गुज़रे

    समुंदरों की हवा दूर दूर से न गुज़र
    वहाँ का हाल सुना हम जहाँ नहीं गुज़रे

    हुजूम-ए-कार जहाँ हो कि दश्त-ए-जाँ का सुकूत
    तिरे फ़िराक़ के सद
    में कहाँ नहीं गुज़रे

    गुज़र गए वो जो जाँ से मगर ये हसरत है
    कोई 'सबा' से ये कह दे मियाँ नहीं गुज़रे
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    उस की शबाहत किसी शम्स-ओ-क़मर में नहीं
    एक उसे देख कर कोई नज़र में नहीं

    क़ासिद ज़ोहरा मक़ाम कह उसे मेरा सलाम
    जिस का नशेमन मिरी राह-गुज़र में नहीं

    क्या कशिश जज़्ब-ए-दिल तुझ में कमी है कि वो
    मेहवर-ए-सय्यारगाँ तेरे असर में नहीं

    चश्म-सितारा-शुमार कुश्ता-सदा इंतिज़ार
    दीद की कोई नवेद नज्म-ए-सहर में नहीं

    हम जो दिखाते नहीं लाला-ओ-गुल की तरह
    ये न समझना कोई दाग़ जिगर में नहीं

    सब्ज़ क़बा-ए-चमन सिर्फ़ फ़रेब-ए-नज़र
    आस की कोंपल किसी शाख़-ए-शजर में नहीं

    एक तुझी को 'सबा' क्यूँ है थकन का गिला
    मौजा-ए-गुल और हवा कौन सफ़र में नहीं
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    9
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    ये सैल-ए-अश्क मुझे गुफ़्तुगू की ताब तो दे
    जो ये कहूँ कि वफ़ा का मिरी हिसाब तो दे

    भरी बहार-रुतों में भी ख़ार ले आई
    ये इंतिज़ार की टहनी कभी गुलाब तो दे

    नहीं नहीं मैं वफ़ा से किनारा-कश तो नहीं
    वो दे रहा है मुझे हिज्र का अज़ाब तो दे

    ये ख़ामुशी तो क़यामत की जान लेवा है
    वो दिल दुखाए मगर बात का जवाब तो दे

    हर एक वाक़िआ' तारीख़-दार लिख जाऊँ
    गए दिनों की मिरे हाथ वो किताब तो दे

    ये देख किस गुल-ए-तर पर निगाह ठहरी है
    न दे वो फूल मुझे दाद-ए-इंतिख़ाब तो दे

    गुनाहगार सही फिर भी मेरे हिस्से का
    तिरी तरफ़ जो निकलता है वो सवाब तो दे
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    8
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    नहीं जाने है वो हर्फ़-ए-सताइश बरमला कहना
    मगर नज़रों ही नज़रों में वो इस का वाह-वा कहना

    सर-ए-महफ़िल करे रुस्वा मिरा बे-साख़्ता कहना
    मिरे फ़नकार ये नाज़ुक-ख़याली वाह क्या कहना

    मिरे नाराज़ शानों को थपक कर बार-हा कहना
    चलो छोड़ो गिले-शिकवे कभी मानो मिरा कहना

    कोई मसरूफ़ियत होगी वगर्ना मस्लहत होगी
    न इस पैमाँ-फ़रामोशी से उस को बे-वफ़ा कहना

    वफ़ा तो ख़ैर क्या होती चलो ये भी ग़नीमत है
    मिरी बे-बस्तगी को ख़ुद रक़ीबों को बुरा कहना
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    ब-ज़ाहिर रौनक़ों में बज़्म-आराई में जीते हैं
    हक़ीक़त है कि हम तन्हा हैं तन्हाई में जीते हैं

    सजा कर चार-सू रंगीं महल तेरे ख़यालों के
    तिरी यादों की रा'नाई में ज़ेबाई में जीते हैं

    ख़ुशा हम इम्तिहान-ए-दश्त-गर्दी के नतीजे में
    ब-सद-एजाज़ मश्क़-ए-आबला-पाई में जीते हैं

    सितम-गारों ने आईन-ए-वफ़ा मंसूख़ कर डाला
    मगर कुछ लोग अभी उम्मीद-ए-अजराई में जीते हैं
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    6
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    ग़मों से अपने कोई शख़्स चूर होता है
    किसी के दिल में ख़ुशी का ग़ुरूर होता है

    बड़े जतन से किसी को भुला दिया हम ने
    बड़े जतन से ये सहरा उबूर होता है

    किसी की कोई दुआ भी न हो सकी पूरी
    किसी किसी की दु'आओं में नूर होता है

    किसी की दूरियाँ दिल को सता सता मारें
    क़रीब रह के कोई शख़्स दूर होता है

    जहाँ में नामवरों के अज़ाब क्या कहिए
    ज़रा सी बात का चर्चा ज़रूर होता है
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    Sabiha Saba
    5
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    दिल में आ जा दिलबर साईं
    सूना तुझ बिन ये घर साईं

    तू क्या जाने इस दूरी में
    क्या बीती है दिल पर साईं

    याद ही मेरा सरमाया है
    तू भी याद किया कर साईं

    दुख की आँच है धीमी धीमी
    दुख तो दिल के अंदर साईं

    उस को मिल जाती है मंज़िल
    जिस को प्यारा वो दर साईं
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    जब कभी हादसात ने मारा
    यूँ लगा काएनात ने मारा

    वो जो मंसूर की अदा ठहरी
    उस को इज़हार-ए-ज़ात ने मारा

    लोग दुनिया का ग़म उठाते हैं
    हम को छोटी सी बात ने मारा

    हम न मुँह फेर कर गुज़र पाए
    चंद लम्हों के सात ने मारा

    दिन तो कट ही गया था उन का मगर
    कम-नसीबों को रात ने मारा

    मौत का दम सबा ग़नीमत है
    वर्ना पल पल हयात ने मारा
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    ये दिल की दास्तान है कि दिल ग़ुलाम कर दिया
    अजीब लोग आप हैं अजीब काम कर दिया

    तुम्हारी ये सख़ावतें तुम्हारी ये इनायतें
    जो ग़म तुम्हारे पास था हमारे नाम कर दिया

    दिलों का भेद खुल गया तो फिर अजीब रंग में
    दबी दबी सी बात को किसी ने आम कर दिया

    किसी को सुर्ख़-रू किया किसी की बज़्म-ए-शौक़ में
    ज़रा ज़रा सी बात पर ये एहतिमाम कर दिया

    कभी हमें बुरा लगा कभी हमें भला लगा
    हमारे दिल की बात को किसी ने आम कर दिया

    उड़ान ख़ूब-तर हुई जो पंछियों की डार की
    तो घेर-घार कर किसी ने ज़ेर-ए-दाम कर दिया
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    Sabiha Saba
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    अगर नहीं है इजाज़त सवाल मत करना
    और अपने दिल में ज़ियादा मलाल मत करना

    नहीं थी कोई ख़बर क्या है आस-पास मिरे
    मैं अपनी सोच में गुम थी ख़याल मत करना

    ख़ुशी से गुज़रे ये सब के लिए तो अच्छा है
    ये ज़िंदगी है इसे भी वबाल मत करना

    'सबा' जो आएगी मुश्किल वो हल भी कर लेंगे
    ख़ुद अपने वास्ते जीना मुहाल मत करना
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    Sabiha Saba
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