Virendra Khare Akela

Virendra Khare Akela

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Virendra Khare Akela shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Virendra Khare Akela's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

यही अंजाम अक्सर हम ने देखा है मोहब्बत का कहीं राधा तरसती है कहीं कान्हा तरसता है — Virendra Khare Akela

Ghazal

कुछ ऐसे ही तुम्हारे बिन ये दिल मेरा तरसता है खिलौनों के लिए मुफ़्लिस का ज्यूँँ बच्चा तरसता है गए वो दिन कि जब ये तिश्नगी फ़रियाद करती थी बुझाने को हमारी प्यास अब दरिया तरसता है नफ़ा नुक़सान का झंझट तो होता है तिजारत में मोहब्बत हो तो पीतल के लिए सोना तरसता है न जाने कब तलक होगी मेहरबानी घटाओं की चमन के वास्ते कितना ये वीराना तरसता है यही अंजाम अक्सर हम ने देखा है मोहब्बत का कहीं राधा तरसती है कहीं कान्हा तरसता है पता कुछ भी नहीं हम को मगर हम सब समझते हैं किसी बस्ती की ख़ातिर क्यूँ वो बंजारा तरसता है कि आख़िर ऐ 'अकेला' सब्र भी रक्खे कहाँ तक दिल बहुत कुछ बोलने को अब तो ये गूँगा तरसता है — Virendra Khare Akela
अदावत दिल में रखते हैं मगर यारी दिखाते हैं न जाने लोग भी क्या क्या अदाकारी दिखाते हैं यक़ीनन उन का जी भरने लगा है मेज़बानी से वो कुछ दिन से हमें जाती हुई लॉरी दिखाते हैं उलझना है हमें बंजर ज़मीनों की हक़ीक़त से उन्हें क्या वो तो बस काग़ज़ पे फुलवारी दिखाते हैं मदद करने से पहले तुम हक़ीक़त भी परख लेना यहाँ पर आदतन कुछ लोग लाचारी दिखाते हैं डराना चाहते हैं वो हमें भी धमकियाँ दे कर बड़े नादान हैं पानी को चिंगारी दिखाते हैं दरख़्तों की हिफ़ाज़त करने वालो डर नहीं जाना दिखाने दो अगर कुछ सर-फिरे आरी दिखाते हैं हिमाक़त क़ाबिल-ए-तारीफ़ है उन की 'अकेला' जी हमीं से काम है हम को ही रंग-दारी दिखाते हैं — Virendra Khare Akela
लोग भी किया हैं किसी का दिल दुखा कर ख़ुश हुए फूल पर बैठी हुई तितली उड़ा कर ख़ुश हुए प्यास हम अपनी बुझा लें ये इजाज़त है कहाँ फिर भी ऐ दरिया तिरे नज़दीक आ कर ख़ुश हुए मर्ज़ को पाले हुए रखना समझदारी नहीं लोग फिर भी ख़ामियाँ अपनी छुपा कर ख़ुश हुए शक्ल-ओ-सूरत देखने लाएक़ थी तब सय्याद की क़ैद पंछी जब परों को फड़फड़ा कर ख़ुश हुए आख़िरश करते भी किया जब क्लास में टीचर न था सारे बच्चा बच्चियाँ ऊधम मचा कर ख़ुश हुए बोझ दिल का एक ही झटके में हल्क़ा हो गया हम तुम्हारी याद में ख़ुद को रुला कर ख़ुश हुए ऐ 'अकेला' और क्या होना था बस इतना हुआ सर-फिरे झोंके चराग़ों को बुझा कर ख़ुश हुए — Virendra Khare Akela
ख़्वाब ख़ुश-फ़हमी ख़ुशी सब कुछ मिटा कर रख दिया उस ने दो ही रोज़ में मुझ को भुला कर रख दिया ये करिश्मा कम से कम इंसान के बस का नहीं किस ने फिर पत्थर पे ये पौधा उगा कर रख दिया सब की नज़रों में ये दौलत आ न जाए इस लिए मैं ने तेरा दर्द ग़ज़लों में छुपा कर रख दिया तर्क-ए-मय करने ही वाला था मगर अब क्या करूँँ जाम साक़ी ने मिरे हाथों पे ला कर रख दिया सिर्फ़ असली बात ही बोली नहीं कम्बख़्त ने कुल-जहाँ का यूँँ तो अफ़्साना सुना कर रख दिया क्या हसीं क्या पुर-सुकूँ सपना अधूरा रह गया और सो लेने दिया होता जगा कर रख दिया ऐ 'अकेला' हो गई अपनी भी रुस्वाई बहुत हम ने उस रुख़ से मगर पर्दा हटा कर रख दिया — Virendra Khare Akela
बंदा तो हुज़ूर आप के काम आया बहुत है ये भी है बजा आप ने ठुकराया बहुत है उल्फ़त है कि है दिल-लगी मुझ को नहीं मालूम फिर चाँद मुझे देख के मुस्काया बहुत है दुनिया मुझे सूली पे चढ़ा दे तो चढ़ा दे उल्फ़त का सबक़ मैं ने भी दोहराया बहुत है ये बात बजा की है मदद शुक्रिया साहिब एहसान मगर आप ने जतलाया बहुत है गुम-सुम सा कई रोज़ से दिखता है वो ज़ालिम शायद मिरा दिल तोड़ के पछताया बहुत है ख़ुद की भी कभी शक्ल ज़रा देख लें साहिब आईना मुझे आप ने दिखलाया बहुत है अब अक़्ल का दुश्मन जो न समझे तो न समझे मैं ने दिल-ए-नादान को समझाया बहुत है अफ़्सोस नहीं क़त्ल का मुझ को मिरे क़ातिल ग़म है यही तू ने मुझे तड़पाया बहुत है ईमान ओ धरम ताक पे देखो तो 'अकेला' पैसे के लिए आदमी पगलाया बहुत है — Virendra Khare Akela
अदावत दिल में रखते हैं मगर यारी दिखाते हैं न जाने लोग भी क्या क्या अदाकारी दिखाते हैं यक़ीनन उन का जी भरने लगा है मेज़बानी से वो कुछ दिन से हमें जाती हुई लॉरी दिखाते हैं उलझना है हमें बंजर ज़मीनों की हक़ीक़त से उन्हें क्या वो तो बस काग़ज़ पे फुलवारी दिखाते हैं मदद करने से पहले तुम हक़ीक़त भी परख लेना यहाँ पर आदतन कुछ लोग लाचारी दिखाते हैं डराना चाहते हैं वो हमें भी धमकियाँ दे कर बड़े नादान हैं पानी को चिंगारी दिखाते हैं दरख़्तों की हिफ़ाज़त करने वालो डर नहीं जाना दिखाने दो अगर कुछ सर-फिरे आरी दिखाते हैं हिमाक़त क़ाबिल-ए-तारीफ़ है उन की 'अकेला' जी हमीं से काम है हम को ही रंग-दारी दिखाते हैं — Virendra Khare Akela