ख़्वाब ख़ुश-फ़हमी ख़ुशी सब कुछ मिटा कर रख दिया
उस ने दो ही रोज़ में मुझ को भुला कर रख दिया
ये करिश्मा कम से कम इंसान के बस का नहीं
किस ने फिर पत्थर पे ये पौधा उगा कर रख दिया
सब की नज़रों में ये दौलत आ न जाए इस लिए
मैं ने तेरा दर्द ग़ज़लों में छुपा कर रख दिया
तर्क-ए-मय करने ही वाला था मगर अब क्या करूँँ
जाम साक़ी ने मिरे हाथों पे ला कर रख दिया
सिर्फ़ असली बात ही बोली नहीं कम्बख़्त ने
कुल-जहाँ का यूँँ तो अफ़्साना सुना कर रख दिया
क्या हसीं क्या पुर-सुकूँ सपना अधूरा रह गया
और सो लेने दिया होता जगा कर रख दिया
ऐ 'अकेला' हो गई अपनी भी रुस्वाई बहुत
हम ने उस रुख़ से मगर पर्दा हटा कर रख दिया
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