कुछ ऐसे ही तुम्हारे बिन ये दिल मेरा तरसता है

खिलौनों के लिए मुफ़्लिस का ज्यूँ बच्चा तरसता है

गए वो दिन कि जब ये तिश्नगी फ़रियाद करती थी
बुझाने को हमारी प्यास अब दरिया तरसता है

नफ़ा नुक़सान का झंझट तो होता है तिजारत में
मोहब्बत हो तो पीतल के लिए सोना तरसता है

न जाने कब तलक होगी मेहरबानी घटाओं की
चमन के वास्ते कितना ये वीराना तरसता है

यही अंजाम अक्सर हम ने देखा है मोहब्बत का
कहीं राधा तरसती है कहीं कान्हा तरसता है

पता कुछ भी नहीं हम को मगर हम सब समझते हैं
किसी बस्ती की ख़ातिर क्यूँ वो बंजारा तरसता है

कि आख़िर ऐ 'अकेला' सब्र भी रक्खे कहाँ तक दिल
बहुत कुछ बोलने को अब तो ये गूँगा तरसता है

— Virendra Khare Akela

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