कब से बैठे थे नज़रें जमाए
आप आए तो हम मुस्कुराए
दिल में जो है वो कह दो मुझे तुम
कब से बैठे हो पलकें झुकाए
कुछ किताबें हैं बस ताक़ पर और
हर तरफ़ बिखरे यादों के साए
ज़िक्र इक बेवफ़ा का हुआ था
आप क्यूँँ बारहा सकपकाए
मैं दराज़ों में दिल ढूँढता हूँ
कोई जाए तो ऐसा न जाए
आख़िरी है दिया आख़िरी साँस
आख़िरी लौ कहीं बुझ न जाए
तुम नए रास्तों पर चलो अब
उसको छोड़ो वो आए न आए
चाक दामन फटे होंठ नम दीद
कोई ख़ुद को भी कितना गिराए
है यही इल्तिजा कातिब-ए-वक़्त
मौत आए अगर वो न आए
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