दिल तेरी क़ैद में इतना मजबूर है
मेरे अंदर है मुझ से मगर दूर है
चोट दोनों को आई जुदाई से पर
ज़ख़्म उस का है मेरा तो नासूर है
मेरे ग़म पर हँसे तो अजब क्या हुआ
यार ये तो ज़माने का दस्तूर है
मुझ से पहले ही सबने कहा था कि वो
दिल दुखाएगी आदत से मजबूर है
कोई देना जो चाहे तो आराम दे
दर्द पहले से सीने में भरपूर है
— Anas Khan















