यूँँ ही ज़बाँ पे लग गया क़तरा शराब का

शब भर रहा दिमाग़ पे क़ब्ज़ा शराब का

मुझ पर ख़ुमार तो नहीं तन्हा शराब का
आधा नशा है इश्क़ का आधा शराब का

यादें तुम्हारी होश में तड़पाएँगी हमें
मर जाएँगे अगर नशा उतरा शराब का

इक दो गिलास से मेरा होगा भी क्या मियाँ
लाओ कोई नदी कोई दरिया शराब का

आसान है पता मेरा मस्जिद के सामने
इक दो मकान छोड़ के ठेका शराब का

हम को ग़ज़ल तो फूल पे लिखनी थी पर 'अनस'
जाने कहाँ से आ गया मिसरा शराब का

— Anas Khan

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