aaj bazaar khareedaar purane nikle | आज बाज़ार ख़रीदार पुराने निकले

  - Anis shah anis

आज बाज़ार ख़रीदार पुराने निकले
खोटे सिक्के हैं जो उनके वो चलाने निकले

अपनी ढपली वो लिए राग सुनाने निकले
कुछ तमाशाई फ़क़त शोर मचाने निकले

ये जो जुगनू तो ग़ज़ब के ही सयाने निकले
जल के मर जाएँगे सूरज को बुझाने निकले

जिनका अपना ही नहीं कोई वजूद अब तक ही
मेरी हस्ती को वही लोग मिटाने निकले

दाग़ अब ढूँढ रहे अंधे मेरे चेहरे पर
और गूँगे मेरी आवाज़ दबाने निकले

हो गये हैं वो ज़मींदोज़ वहीं पर सारे
मेरी बुनियाद के पत्थर जो हिलाने निकले

ख़ाली निकले हैं निशाने तो सभी उनके ही
जो कमाँ हाथ लिए तीर चलाने निकले

जो मेरे क़त्ल में शामिल थे मेरे क़ातिल थे
मेरी मय्यत में वही काँधा लगाने निकले

की है तफ़्तीश जो मैंने तो ये मालूम हुआ
जो भी दुश्मन हैं मेरे दोस्त पुराने निकले

याद माज़ी को किया करते हैं ख़ुश होते हैं
भूल जाते हैं कि अब उनके ज़माने निकले

हो गया ग़र्क़ सफ़ीना तो अनीस  उनका ही
मेरी कश्ती जो समंदर में डुबाने निकले

  - Anis shah anis

More by Anis shah anis

As you were reading Shayari by Anis shah anis

Similar Writers

our suggestion based on Anis shah anis

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari