तेरी बातों में सच्चाई नहीं है
कि मुझ
में कुछ भी अच्छाई नहीं है
तुझे नज़रें झुका कर देखता हूँ
तेरे क़द में जो ऊँचाई नहीं है
यक़ीं कैसे दिलाएगा तू ख़ुद को
तेरा दिल मेरा शैदाई नहीं है
दिया इल्ज़ाम तू ने आईने पर
तेरे रुख़ पर ही रा'नाई नहीं है
बहुत चाहा कि तुझ
में डूब जाऊँ
करूँ क्या तुझ
में गहराई नहीं है
चुराता है निगाहें मुझ से तू यूँ
कि मुझ से ज्यूँ शनासाई नहीं है
क़ुसूर इस
में चराग़ों का नहीं कुछ
तेरी आँखों में बीनाई नहीं है
अगर बदनाम तू रिश्ता करेगा
तो क्या तेरी ये रुस्वाई नहीं है
समझता है बहुत नादान सब को
मगर तुझ में ही दानाई नहीं है
अनीस अब कौन देगा राह तुझ को
अगर तुझ
में तवानाई नहीं है
— Anis shah anis















