जोश को कुछ लोग पागलपन समझते
ऐसे पागलपन को शायर फ़न समझते
'इश्क़ में जो फूल लाया प्लास्टिक का
उन सेे पूछे आप क्या गुलशन समझते
कुछ बताते है कमी हर एक की जब
सोचता हूँ मैं वो क्या दर्पन समझते
चाहिए अमृत उन्हें भी ज़िंदगी में
आख़िरी दम तक नहीं मंथन समझते
भावना के खेल के माहिर खिलाड़ी
लोग ये थोड़ी किसी का मन समझते
फ़ायदा गिनवा रहें है भूलने का
'इश्क़ में उसको 'धरम' निर्धन समझते
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