हमारे बा'द चर्चा कर रहे हैं
तिरी यादों को रुस्वा कर रहे हैं
ग़ज़ल की नाव में बैठे हुए हम
तिरे ग़म से किनारा कर रहे हैं
तबस्सुम था कभी गहना हमारा
उदासी से गुज़ारा कर रहे हैं
तिरी ये बे-हयाई और तग़ाफ़ुल
रक़ीबों को इशारा कर रहे हैं
बुरा है वक़्त सो हम ज़िंदगी में
किसी पर भी भरोसा कर रहे हैं
शिकायत क्या करें हम दुश्मनों से
हबीबों से किनारा कर रहे हैं
— Rohit Gustakh















