ग़म-ए-दिल से कोई रिहाई न दे
दुआ दे मुझे पर दवाई न दे
जो मौजूद है वो है कुछ भी नहीं
हक़ीक़त है वो जो दिखाई न दे
मुझे ऐसी मंज़िल को पाना है अब
जो लुत्फ़-ए-सफ़र से रिहाई न दे
मैं करता हूँ शर्तों पे जीवन बसर
मुझे कुछ सुहुलत पराई न दे
जो क़ातिल है वो ही है मुंसिफ़ यहाँ
सो बेहतर है कोई सफ़ाई न दे
रहो चल के ऐसी जगह कैफ़ तुम
ये दुनिया जहाँ से दिखाई न दे
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