सुर्ख़ हीरे से कोयला करके
उसने छोड़ा है क्या से क्या करके
क्यूँँ न दुनिया कफ़स बना दें हम
सब परिंदों से मशवरा करके
क्या मिला है सिवाए नाकामी
ज़िंदगी तुझ सेे इल्तिजा करके
कितने हिस्सों में बँट गए हैं हम
एक होने का फ़ैसला करके
एक सूरज वुजूद में लाओ
सब चराग़ों को मुजतमा करके
अब वो कहने को आदमी भी नहीं
उसने छोड़ा जिसे ख़ुदा करके
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