हिज्र में मुब्तला नहीं होना
अब हमें ग़म-ज़दा नहीं होना
हिज्र के बा'द मुतमइन हैं यूँ
जैसे अब कुछ बुरा नहीं होना
यूँ तो सहरा की धूल हूँ बेशक
पर मुझे ज़ेर-ए-पा नहीं होना
शौक़-ए-दीदार मर गया मेरा
और उस को ख़ुदा नहीं होना
ख़्वाब आँखों से कर गया हिजरत
नींद को पर ख़फ़ा नहीं होना
तू फ़क़त एक बार मिलती है
ज़िन्दगी! मसअला नहीं होना
दाग़-ए-हस्ती को देख कर तय है
ज़ख़्म-ए-जाँ अब हरा नहीं होना
अब ये कश्ती तेरे हवाले है
अब मुझे ना-ख़ुदा नहीं होना
चाहता हूँ मुझे सुनाई दे
शोर जिस को सदा नहीं होना
पुर है मेरा वुजूद वहशत से
इस बदन को ख़ला नहीं होना
— Kaif Uddin Khan















