mera qaateel hi mera munsif hai | मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है

  - Sudarshan Fakir

मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है
क्या मिरे हक़ में फ़ैसला देगा

  - Sudarshan Fakir

Child labour Shayari

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    इस ज़िन्दगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
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    मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ

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    ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ

    मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़तल
    सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ

    ये आलम है, कि अपने ही लहू में
    सरासर डूब जाना चाहता हूँ

    सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
    सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ

    उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
    वही मंज़र पुराना चाहता हूँ

    नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
    जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ

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    Kazim Rizvi
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    आप कहते थे कि रोने से न बदलेंगे नसीब
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    आदमी आदमी को क्या देगा
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    मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिब है
    क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा

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    इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा

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    इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया
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    उम्र भर आप की इस बात ने रोने न दिया

    रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें
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    जीने वाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं

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    जिस को महबूब की हाथों की हिना कहते हैं
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