करना चाहा फ़ना ज़िंदगी ने
था
में रक्खा मुझे बेहिसी ने
दर-ब-दर फिरता हूँ मैं ये कह कर
दी है छत मुझको आवारगी ने
सहरा तक आ गया हूँ तिरे साथ
मार डाला है लब-तिश्नगी ने
हँसना था और छुपाने थे आँसू
देखा हँस कर के बेचारगी ने
बाप का कंधा और माँ का आँचल
ये सहूलत है दी ज़िंदगी ने
बद-हवा सेी की ख़ातिर थी पी और
होश में रक्खा संजीदगी ने
आते-जाते दिखा करता था जो
डस लिया उसको अफ़सुर्दगी ने
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