ज़माने में निभाने को बहुत यूँँ तो सहारे थे
न शामिल ज़िक्र तेरा नाम जो मैंने पुकारे थे
तिरे वादों की ख़ातिर महज़ तोड़े राब्ते सारे
मोहब्बत के समंदर में न सोहबत के किनारे थे
तग़ाफ़ुल का गिला तुझ सेे करें तेरी ही महफ़िल में
रक़ीबों को ख़बर तो हो कभी तुम भी हमारे थे
निभाने में क़सर बाक़ी न छोड़ी याद तो होगा
मोहब्बत के जुनूँ में जो ख़म-ए-गेसू सँवारे थे
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