ज़माने में निभाने को बहुत यूँँ तो सहारे थे

न शामिल ज़िक्र तेरा नाम जो मैं ने पुकारे थे

तिरे वादों की ख़ातिर महज़ तोड़े राब्ते सारे
मोहब्बत के समुंदर में न सोहबत के किनारे थे

तग़ाफ़ुल का गिला तुझ से करें तेरी ही महफ़िल में
रक़ीबों को ख़बर तो हो कभी तुम भी हमारे थे

निभाने में क़सर बाक़ी न छोड़ी याद तो होगा
मोहब्बत के जुनूँ में जो ख़म-ए-गेसू सँवारे थे

— Rohan Hamirpuriya

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