थी जिसकी जुस्तुजू वो न हरगिज़ मिला मुझे
इस बात का नहीं रहा कोई गिला मुझे
तेरी ख़ुदाई से नहीं इनकार ऐ ख़ुदा
पाने की आरज़ू है जिसे वो दिला मुझे
उलझा दिया था ज़िन्दगी ने कश्मकश में यूँँ
ता'उम्र कोई रस्ता न घर का मिला मुझे
साक़ी पिलाता है तो बढ़े मेरी तिश्नगी
उल्फ़त का है जुनूँ तो लबों से पिला मुझे
इतना तो तजरबा हो गया है निभाने का
वाक़िफ़ हूँ मैं पता है वफ़ा का सिला मुझे
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