वक़्त रहते हम ग़म का हर सबब बता देते
ग़म का था जो बादल इक ज़ेहन से हटा देते
पूछता अगर मंज़िल का वो रास्ता हम से
हम भी उसको हँस कर के बस तेरा पता देते
तेरा हाथ कर देते हम रक़ीब की जानिब
इक ख़ुशी की ख़ातिर हम ख़ुद को ये सज़ा देते
राज़ी हो गया होता तू अगर निभाने को
सब महल अटारी हम तुझ पे ही लुटा देते
होने लगता है मेरा ख़्वाब इक मुकम्मल जब
जो ख़याल सरकश है वो मुझे जगा देते
चंद रोज़ चल जाता सिलसिला निभाने का
ग़ैर से त'अल्लुक़ सब तुम भी गर मिटा देते
ज़ख़्म ठीक होने में थोड़ा वक़्त कम लगता
हाथों से अगर अपने वो दवा पिला देते
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