आइना ख़ुद से सँवरना चाहता है
सामने बनना वो अच्छा चाहता है
सुगबुगाहट यार रिश्तों में बड़ी अब
राब्ता सब तोड़ जाना चाहता है
खा गया घुन जैसे लकड़ी धीरे धीरे
ऐसे वो बद-कार बनना चाहता है
खा गई थी इक ग़लत ये सोच उसको
जो क़बीला ख़ुद से ज़्यादा चाहता है
दर्द की तो 'उम्र उसकी बढ़ रही थी
वो यक़ीनन मौत पाना चाहता है
जब हुए जश्न-ए-तुवा से सब परेशाँ
तू इसे क्यूँ आज़माना चाहता है
शायरी में ये दुआ हर बार करता
इक ललित सबको हँसाना चाहता है
As you were reading Shayari by Lalit Mohan Joshi
our suggestion based on Lalit Mohan Joshi
As you were reading undefined Shayari