पत्थर ने हमको यार पत्थर ही कहा
हमने मगर देखो उसे घर ही कहा
वो दिल लगाता हम सेे क्यूँ फिर अब कहो
जब हमको दिल से उसने बंजर ही कहा
बेकार जीना मेरा हो शायद गया
जब उसने भी मुझको तो ख़ंजर ही कहा
हम कब से थे तन्हा अकेले यार पर
हमने उसे तब भी समंदर ही कहा
क्यूँ जाने है वो इतना हम सेे रूठा फिर
जब उसको तो हमने सिकंदर ही कहा
वो चाँद तारे आसमाँ पर लिखता है
हमको मगर सबने सुख़न-वर ही कहा
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