ab vo pehli sii muhabbat phir kahaan | अब वो पहली सी मुहब्बत फिर कहाँ

  - Lalit Mohan Joshi

अब वो पहली सी मुहब्बत फिर कहाँ
यूँँ मिले मुफ़्लिस को दौलत फिर कहाँ

लोग सब हैं शहर के मुझ सेे खफ़ा
शहर में रहती वो ज़ीनत फिर कहाँ

देखने में कोई अब अपना नहीं
उसके जैसी अब वो सूरत फिर कहाँ

हँस दिया है मेरा दुश्मन मुझ पे अब
आँख को आँसू से फ़ुर्सत फिर कहाँ

ज़िंदगी में क्यूँ हुआ है ग़म बहुत
उड़ते पंछी सी तबीयत फिर कहाँ

आइना अब सच दिखाता है नहीं
यार उस
में अब वो जुरअत फिर कहाँ

  - Lalit Mohan Joshi

More by Lalit Mohan Joshi

As you were reading Shayari by Lalit Mohan Joshi

Similar Writers

our suggestion based on Lalit Mohan Joshi

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari