dukh dard phir naseeb ho gaya tha | दुख दर्द फिर नसीब हो गया था

  - Lalit Mohan Joshi

दुख दर्द फिर नसीब हो गया था
जैसे मेरा नसीब सो गया था

ख़ुशबू से उसकी यार मैं था ज़िंदा
पत्थर सा वरना मैं तो हो गया था

कल देर तक था चाँद मेरी छत पर
मैं बिन गए ही छत पे सो गया था


वो बेवफ़ा हुआ तो क्या कहूँ मैं

पागल मगर कहीं मैं हो गया था
ख़त उसने वो मिरा दिया न खोला

यादों में क्यूँँ मगर मैं खो गया था
मिसरे पे पहले दाद वाह सब पर

दूजे पे हर कोई तो रो गया था
जादू ये मेरा था या उसका था ये

हर कोई अब यहाँ तो रो गया था
महफ़िल में आ गया मुझे वो सुनने

फिर रोते घर की ओर को गया था
अब तो 'ललित' सुनाए भी तो क्या ही

हर कोई याद में यूँँ खो गया था

  - Lalit Mohan Joshi

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