vida hote hue maa kii vo roti aankh dekhi hai | विदा होते हुए माँ की वो रोती आँख देखी है

  - Lalit Mohan Joshi

विदा होते हुए माँ की वो रोती आँख देखी है
हवा ये शहर की अब तो चुभोती आँख देखी है

ज़माने की यहाँ ये रीत क्या है और कैसी है
यहाँ माँ बाप की अब मैंने रोती आँख देखी है

फ़क़त मैं चाहता रहना तो अपने गाँव में लेकिन
मगर मैंने तो तन्हाई को ढोती आँख देखी है

मिरा तो चैन अल्मोड़ा के छोटे गाँव में ही है
ग़मों से गाँव की सड़कें भिगोती आँख देखी है

यहाँ तो अश्क मेरे एक दिन हो बर्फ़ जाएँगे
यक़ीनन गाँव से अब शहर होती आँख देखी है

  - Lalit Mohan Joshi

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