sar jo jhukaakar chal raha tha main yahaañ | सर जो झुकाकर चल रहा था मैं यहाँ

  - Manoj Devdutt

सर जो झुकाकर चल रहा था मैं यहाँ
फिर कब किसी को खल रहा था मैं यहाँ

कैसे तुझे जाने दिया था ख़ुद से दूर
अब हाथ अपने मल रहा था मैं यहाँ

क़ीमत मुझे रोटी की है मालूम रोज़
इक वक़्त पर जो पल रहा था मैं यहाँ

मालूम है मुझको हक़ीक़त अब सभी
पर ख़ुद ही ख़ुद को छल रहा था मैं यहाँ

कोशिश हुई हर दिन गिराने की मुझे
फिर भी मुसलसल चल रहा था मैं यहाँ

  - Manoj Devdutt

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