तुम साथ थे तो कितना आसाँ था मगरअब जाना है कितना कठिन है ये सफ़रजब सोचता हूँ तो नहीं आता यक़ीनकल तक मैं ही था तेरा मंज़ूर-ए-नज़र— MIR SHAHRYAAR