ज़िंदगी तो ज़िंदगी है
हाँ यही कुछ चंद की है
गर गुज़ारें सौ बरस भी
आख़िरश फिर मौत ही है
है ख़ुदा गर काफ़ी फिर क्यूँ
दुनिया की यूँ तिश्नगी है
आख़िरत का इल्म है पर
बात सुन कर अनसुनी है
है क़यामत सर पे मोहसिन
हर तरफ़ आवारगी है
— Mohsin Ahmad Khan
हाँ यही कुछ चंद की है
गर गुज़ारें सौ बरस भी
आख़िरश फिर मौत ही है
है ख़ुदा गर काफ़ी फिर क्यूँ
दुनिया की यूँ तिश्नगी है
आख़िरत का इल्म है पर
बात सुन कर अनसुनी है
है क़यामत सर पे मोहसिन
हर तरफ़ आवारगी है
Other ghazal from the same pen
Shers of maut.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling