सदाक़त छुपाने कि ज़िद पर अड़े थे
ये वो लोग थे जो कि सब में बड़े थे
कहीं से भी संगत न छूटी, अराज़िल
तभी तो मुलाज़िम के सर पे खड़े थे
वसीयत कि लालच में जलते रहे घर
सुना है बड़े घर के बच्चे लड़े थे
ज़मीं की सतह से ये मिट्टी मिली बस
असल में ख़ज़ाने तो नीचे गड़े थे
शजर एक आँसू से काटा गया था
दो आँगन में शाख़ों से पत्ते झड़े थे
मसाफ़ी कि तलवार जिस दिन चली थी
वज़ीरों के सर सब से आगे पड़े थे
बड़ी जल्दबाज़ी में लाशें छुपा दीं
कि जैसे कफ़न में सितारे जड़े थे
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