गुस्ताख़ निगाहों की कुछ और कहानी है
कुछ बात रही होगी जो याद ज़बानी है
महरूम किया जाए हर एक शिफ़ा-दाँ को
ये ज़ख़्म सुख़न-वर की मशहूर निशानी है
मैं शर्त लगाता हूँ हर शख़्स बना लेगा
महबूब कि वो जो इक तस्वीर पुरानी है
जो हाथ लगे ले जा या आग लगा उसको
इस घर से मुझे उनकी हर चीज़ हटानी है
साक़ी ये तिरे पहलू में जाम बचा है क्या
तू देख अगर हो तो दो और पिलानी है
मैं रूह जलाता हूँ जिस बज़्म के कोने में
सुनती हैं ग़ज़ल मेरी दीवार दिवानी है
जो इश्क़ करेंगे तो ये बात समझ लेंगे
इस खेल के आख़िर में बस जान गँवानी है
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