तमाम रंज का क़िस्सा उछाल देता हूँ
मिरी ग़ज़ल से ही मिसरा उछाल देता हूँ
हसीन मौत से लड़ती है ज़िंदगी तब मैं
मिरे नसीब का सिक्का उछाल देता हूँ
ये सोच कर कि मिरे दिल का भार कम होगा
सियाह रूह का हिस्सा उछाल देता हूँ
डुबा रही है मुझे मेरी मय-कशी की लत
मैं आग से मिरा रिश्ता उछाल देता हूँ
ज़मीन रोज़ शिकायत ख़ुदा से करती है
यूँ आसमान में दरिया उछाल देता हूँ
— Nikhil Tiwari 'Nazeel'















