akshar kuchh aise bhi aalam hote the | अक्सर कुछ ऐसे भी आलम होते थे

  - Nikhil Tiwari 'Nazeel'

अक्सर कुछ ऐसे भी आलम होते थे
हम उनके शाने पे बे-दम होते थे

माना मेरी ज़द में दरिया रुकता था
माना उनके अपने मौसम होते थे

मुझको मत बतलाओ मैंने देखा है
किस मजलिस में कितने अदहम होते थे

ग़म में पीने वाले 'आशिक़ क्या जाने
ज़हर-ए-क़ातिल बेहतर मरहम होते थे

दीवारें ही सब कुछ सच सच कहती थीं
किन लड़कों के कमरे दरहम होते थे

वो कहते थे दिल में ख़ंजर उतरेगा
हम ही पागल हर दिन चे-ग़म होते थे

उन गलियों में अच्छी ख़ासी रौनक़ है
जिन गलियों में कल तक मातम होते थे

  - Nikhil Tiwari 'Nazeel'

Nadii Shayari

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