कह नहीं सकता मुहब्बत हो रही है
मुझ को लेकिन तेरी आदत हो रही है
तेरे दरियाओं पे लानत हो रही है
दश्त में प्यासों की इज़्ज़त हो रही है
ख़ूब-सूरत लोग मारे जा रहे हैं
दुनिया कितनी बे-मुरव्वत हो रही है
दिन-ब-दिन मैं शे'र अच्छे कह रहा हूँ
दिन-ब-दिन तू ख़ूब-सूरत हो रही है
रंग भी अब तेरे मेरे हो गए हैं
फूलों पर जम कर सियासत हो रही है
लब उदासी के सबब सूखे हुए हैं
मुस्कराने में अज़िय्यत हो रही है
— Rehan Mirza














