हमारा 'इश्क़ किसी की समझ में आ न सका
कि हफ़्ते भर से ज़ियादा कोई निभा न सका
मेरे लिए जो हर इक दुख उठाना चाहता था
पड़ा जो वक़्त तो वो फ़ोन भी उठा न सका
कहाँ तो सोचा था सीने से लग के रोना है
मिला तो हाल भी अपना उसे सुना न सका
वो जिस की चोट पे आँसू बहा रहे थे हम
हमारी मौत का मंज़र उसे रुला न सका
कटी जो शाख़ शजर से तो फिर हरी न हुई
मैं टूटे दिल से कोई फूल भी खिला न सका
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Rehan Mirza
our suggestion based on Rehan Mirza
As you were reading Gulshan Shayari Shayari