पी कर हमारा ख़ून ये लड़की बड़ी हुई
काग़ज़ पे दिल निचोड़ा है तो शा'इरी हुई
तुम से बिछड़ के आए हैं मुझ में सभी हुनर
वो शाख़ हूँ जो पेड़ से कट कर हरी हुई
ये कौन मुझ में रहता है ख़ामोश रात-दिन
ये किस की लाश है मेरे अंदर पड़ी हुई
नज़रें उस एक शख़्स पे जाती हैं बार-बार
दिल पूछता है बोल, मुहब्बत हुई, हुई ?
हम ने अँधेरे में ही बिता दी है सारी उम्र
तुम जिस को मिल गए हो वहाँ चाँदनी हुई
बिखरे हुए से बाल थे, बिगड़ा हुआ सा रूप
करता मगर वो बात था बिल्कुल सधी हुई
— Rehan Mirza















