मुझे वो दूर से बहती नदी नज़र आई
गया तो प्यास को रोती हुई नज़र आई
तुम्हें तलाशने का था जुनून ही ऐसा
जिधर गया मैं तुम्हारी गली नज़र आई
उदास देखे परिंदे भी पेड़ कटने पर
कहीं पे चिड़िया भी रोती हुई नज़र आई
हमारा दुख भी कभी क्या तुम्हें नज़र आया
या बस हमारी ये झूठी हँसी नज़र आई
उसी को बा'द में लहजा बना लिया मैं ने
तुम्हारी ख़ामुशी जो बोलती नज़र आई
— Rehan Mirza















