मैं पहले अपने घर के सारे दरवाज़े लगाता हूँ

हवा की दस्तकों से रात भर फिर दिल लुभाता हूँ

उधर से ख़ुद-कुशी आवाज़ देती है उदासी को
इधर से कॉल जब ख़ुशियों के नंबर पर मिलाता हूँ

कुछ ऐसे हादसे गुज़रे हैं जिन को याद रखने में
मैं छोटी-छोटी बातों को भी अक्सर भूल जाता हूँ

मेरी तुर्बत पे आ कर अब न हंगामा करो ऐसे
ज़रा आराम से बैठो मैं तुम को सब बताता हूँ

ये मेरी बेबसी का इस्तिआरा तो ज़रा देखो
मैं जब कुछ कह नहीं पाता हूँ तो बस मुस्कराता हूँ

मैं ही शाइ'र, मैं ही सा
में', मैं ही हूँ सद्र-ए-महफ़िल भी
अकेला बैठ कर मैं ख़ुद को ही ग़ज़लें सुनाता हूँ

— Rehan Mirza

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