ro lene se dil kab halka hota hai | रो लेने से दिल कब हल्का होता है

  - Rehan Mirza

रो लेने से दिल कब हल्का होता है
दरिया तो हर हाल में दरिया होता है

हिज्र की शब में इतना गिर्या होता है
हर आशिक़ का अपना दरिया होता है

उसको उतनी इज़्ज़त मिलती है साहब
जिसके पास में जितना पैसा होता है

शुरू-शुरू में सब लेते हैं दिल से काम
रफ़्ता-रफ़्ता आदमी दुनिया होता है

बहुत बुरा होता है अच्छा होना भी
अच्छों का नुक़्सान ज़ियादा होता है

सब ग़म की किश्तें भरते मर जाते हैं
सबका ही ख़ुशियों का बीमा होता है

जितनी देर वो मुझ सेे बातें करती है
उतनी देर ही मेरा होना होता है

  - Rehan Mirza

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