यक़ीं की छत से गिरता है ये गमला टूट जाता है

फ़क़त इक झूठ कहने से भरोसा टूट जाता है

तुम्हें दो दिन की यारी ख़त्म होने का बहुत दुख है
यहाँ मज़बूत से मज़बूत रिश्ता टूट जाता है

तुम्हारे मुँह से मीठी बात सुनने का जो आदी हो
तुम्हारे तल्ख़ लहजे से वो कितना टूट जाता है

जवाँ बेटे की मय्यत होती होगी किस क़दर भारी
उसे जब बाप ढोता है तो काँधा टूट जाता है

दुआएँ ख़ुद-कुशी से जाने किस की रोक लेती हैं
लटकता हूँ मैं रस्सी से तो पँखा टूट जाता है

लगाओ दिल मगर ये बात मेरी याद रखना तुम
मुक़द्दर है यही शीशे का शीशा टूट जाता है

— Rehan Mirza

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